महंगा होगा पेट्रोल-डीजल? LPG और तेल लाने के लिए भारत की सबसे बड़ी कंपनी IOC को क्यों नहीं मिला एक भी जहाज

महंगा होगा पेट्रोल-डीजल? LPG और तेल लाने के लिए भारत की सबसे बड़ी कंपनी IOC को क्यों नहीं मिला एक भी जहाज

नई दिल्ली (बिजनेस डेस्क): भारत की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) और आम जनता की जेब से जुड़ी एक बेहद चौंकाने वाली और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। देश की सबसे बड़ी सरकारी तेल रिफाइनिंग और मार्केटिंग कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) को खाड़ी देशों (Gulf Countries) से भारत के लिए कच्चा तेल और एलपीजी (गैस) लाने के लिए जहाज किराये पर (Charter) लेने में अभूतपूर्व संकट का सामना करना पड़ रहा है।

हालात इस कदर गंभीर हो चुके हैं कि इंडियन ऑयल द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी किए गए तीन बड़े मेगा टेंडरों (Tenders) में एक भी शिपिंग कंपनी ने बोली (Bid) नहीं लगाई। यह भारतीय इतिहास में अपनी तरह का बेहद दुर्लभ मामला है, जिसने देश के नीति-निर्माताओं की नींद उड़ा दी है।

आखिर क्यों भारत के लिए जहाज भेजने से डर रही हैं कंपनियां?

इस हैरान कर देने वाले घटनाक्रम के पीछे की मुख्य वजह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) के आसपास बढ़ा भयंकर भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tension) और अंतरराष्ट्रीय जहाज मालिकों की सुरक्षा संबंधी चिंताएं हैं।

दरअसल, इंडियन ऑयल ने पिछले सप्ताह तीन अलग-अलग श्रेणियों के विशालकाय जहाजों को किराये पर लेने के लिए टेंडर निकाले थे:

  1. वेरी लार्ज गैस कैरियर (VLGC) - कतर, कुवैत और यूएई से करीब 45,000 टन एलपीजी लाने के लिए।

  2. वेरी लार्ज क्रूड कैरियर (VLCC) - सऊदी अरब और कुवैत से भारी मात्रा में कच्चा तेल आयात करने के लिए।

  3. सुएजमैक्स (Suezmax) जहाज - खाड़ी के अन्य बंदरगाहों से तेल की सुरक्षित ढुलाई के लिए।

शिपिंग एक्सपर्ट्स का कहना है कि वैश्विक स्तर पर मालवाहक जहाजों के मालिक इस समय "वेट एंड वॉच" (इंतजार करो और देखो) की रणनीति अपना रहे हैं। उन्हें सबसे बड़ा डर यह है कि यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अचानक कोई सैन्य टकराव या राजनीतिक संकट दोबारा भड़कता है, तो उनके अरबों रुपये के जहाजों और क्रू (चालक दल) को भारी नुकसान पहुंच सकता है। इसी खौफ के चलते कोई भी कंपनी कतर के रस लाफान, कुवैत के मीना अल अहमदी या यूएई के रुवैस बंदरगाहों पर अपने जहाज भेजने का जोखिम नहीं उठाना चाहती।

भारत के लिए क्यों खतरनाक है यह स्थिति?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दुनिया की 'ऊर्जा जीवन रेखा' (Energy Lifeline) कहा जाता है, क्योंकि दुनिया का एक-तिहाई समुद्री तेल व्यापार इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है।

  • आयात पर निर्भरता: भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल और एक बड़ा हिस्सा एलपीजी विदेशों से खरीदता है, जिसका अधिकांश भाग इसी खाड़ी मार्ग से आता है।

  • टेंडरों का फेल होना: आईओसी जैसे महारत्न पीएसयू के टेंडरों का पूरी तरह खाली चले जाना यह दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिपिंग कंपनियां खाड़ी क्षेत्र को लेकर कितनी ज्यादा डरी हुई हैं।

क्या देश में महंगा हो जाएगा पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस?

तत्काल कोई संकट नहीं, लेकिन भविष्य की राह मुश्किल:

ऊर्जा मामलों के जानकारों के अनुसार, वर्तमान में भारत के पास पर्याप्त मात्रा में तेल और गैस का बफर स्टॉक (सुरक्षित भंडार) मौजूद है, इसलिए पेट्रोल-डीजल या रसोई गैस की उपलब्धता पर तत्काल कोई सीधा असर नहीं पड़ेगा।

लंबी अवधि में बढ़ सकती है आफत:

लेकिन, यदि जहाजों की यह कमी और कंपनियों का डर अगले कुछ हफ्तों तक ऐसा ही बना रहा, तो आईओसी को मजबूरन बहुत अधिक प्रीमियम (महंगे दाम) देकर जहाजों को ढूंढना होगा। ढुलाई लागत (Freight Costs) और समुद्री इंश्योरेंस (War Risk Insurance) के महंगे होने से तेल आयात करने का खर्च काफी बढ़ जाएगा। अंततः इस बढ़ी हुई लागत का बोझ देश की सरकारी तेल कंपनियों पर पड़ेगा, जो आने वाले समय में उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल-डीजल और एलपीजी सिलेंडरों की कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में सामने आ सकता है।

फिलहाल, इंडियन ऑयल के अधिकारी वैकल्पिक मार्गों और अन्य देशों से तेल सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयासों में जुट गए हैं, लेकिन अंतिम समाधान खाड़ी क्षेत्र में शांति बहाल होने पर ही निर्भर करेगा।

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