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'धमाल 4' में ट्रेंड हो रहे इस ट्रैक का बिहार-यूपी नहीं, इस देश से है अनोखा नाता

बॉलीवुड के सिंघम अजय देवगन की मच-अवेटीड फिल्म 'धमाल 4' का नया गाना 'चटनी' इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर यूट्यूब तक पर गर्दा उड़ा रहा है। रिलीज होने के महज दो दिनों के भीतर ही इस दमदार ट्रैक ने 7.6 मिलियन (76 लाख) से ज्यादा व्यूज बटोर कर नया रिकॉर्ड बना दिया है। इस गाने को मशहूर भोजपुरी सिंगर नीलकमल सिंह और ममता शर्मा ने अपनी कड़क आवाज दी है। अमूमन इस गाने के देसी और भोजपुरी अंदाज को देखकर हर किसी को यही लगता है कि यह उत्तर प्रदेश या बिहार के किसी गांव की देन है। लेकिन आपको यह जानकर बेहद हैरानी होगी कि इस सुपरहिट गाने की पैदाइश न तो बिहार की है और न ही भारत की! तो फिर यह गाना कहां से आया और क्या है इसका इतिहास? आइए आपको इसकी पूरी दिलचस्प इनसाइड स्टोरी बताते हैं।

दबंग 2 के बाद अब धमाल 4 में जलवा, पर भारत से नहीं है इस गाने का असली कनेक्शन

अजय देवगन की 'धमाल 4' से पहले इस सदाबहार गाने के हुक स्टेप पर सलमान खान की फिल्म 'दबंग 2' में भी जमकर ठुमके लगे थे। उस वक्त भी देश भर के संगीत प्रेमियों को यही लगा था कि यह कोई पारंपरिक भोजपुरी लोकगीत है। लेकिन असल में इस गाने का नाता भारत से हजारों मील दूर स्थित एक कैरेबियन देश से है। इस गाने की रूह में भारत के 'गिरमिटिया मजदूरों' के संघर्ष, उनकी बेबसी और अपनी मातृभूमि के लिए तड़प की एक दर्दभरी दास्तान छिपी हुई है।

1833 का वो काला कानून और गन्ने के खेतों से शुरू हुई 'चटनी म्यूजिक' की कहानी

इस अनोखे गाने की शुरुआत आज से करीब दो सदी पहले साल 1833 में हुई थी। उस वक्त ब्रिटिश साम्राज्य ने दुनिया भर में आधिकारिक तौर पर गुलामी प्रथा का अंत किया था। गुलामी खत्म होने के बाद कैरेबियन देशों (वेस्टइंडीज द्वीप समूह) में अंग्रेजों के गन्ने के बड़े-बड़े खेतों में काम करने के लिए सस्ते मजदूरों का भयंकर संकट खड़ा हो गया। इस कमी को पूरा करने के लिए ब्रिटिश हुक्मरानों ने भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार के भोले-भाले गरीब किसानों और कारीगरों को बहलाना-फुसलाना शुरू किया। अंग्रेजों ने उनसे एक एग्रीमेंट (समझौते) पर अंगूठा लगवाया, जिसे स्थानीय भाषा में मजदूर 'गिरमिट' कहते थे और इसी से वे 'गिरमिटिया मजदूर' कहलाए।

अंग्रेज इन भारतीय मजदूरों को बड़े-बड़े पानी के जहाजों में भेड़-बकरियों की तरह भरकर त्रिनिदाद एंड टोबैगो, गुयाना और सूरीनाम जैसी अनजान और सुदूर जगहों पर ले गए। ये मजदूर दिनभर गन्ने के खेतों में हाड़-तोड़ मेहनत करते थे। इसके बाद जब शाम को वे थक-हारकर अपने घरों को लौटते, तो वतन की याद और अपनों के बिछड़ने के गम को कम करने के लिए ढोलक-मंजीरे लेकर भोजपुरी लोकगीत गाते थे। वक्त गुजरने के साथ इन भोजपुरी गीतों में कैरेबियन द्वीप के स्थानीय संगीत 'सोका' (Soca) और 'कैलिप्सो' (Calypso) का एक अनोखा फ्यूजन होने लगा। इस मिलावट से भाषा भी थोड़ी बदल गई और ठेठ भोजपुरी के बीच अंग्रेजी शब्द भी जुड़ने लगे, जिसे दुनिया ने 'चटनी म्यूजिक' का नाम दिया।

56 साल पहले 1970 में सुंदर पोपो ने तैयार किया था यह पहला ऑफिशियल ट्रैक

त्रिनिदाद के एक बेहद मशहूर स्थानीय भारतीय-कैरेबियन कलाकार सुंदर पोपो ने इन पारंपरिक लोकगीतों को आधुनिक वाद्य यंत्रों (म्यूजिकल इंस्ट्रुमेंट्स) के साथ रिकॉर्ड करने की ठानी। इसी कड़ी में साल 1970 में यानी आज से करीब 56 साल पहले पहली बार आधिकारिक तौर पर ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’ गाना दुनिया के सामने आया। इस गाने में इस्तेमाल शब्द 'फुलौरी' का मतलब हमारे यहां बनने वाले बेसन के पकौड़े जैसी ही एक स्वादिष्ट डिश से है। यह गाना कैरेबियन देशों में उस दौर का सबसे बड़ा ब्लॉकबस्टर साबित हुआ और वहां रह रहे भारतीय मूल के लोगों की हर शादी, पार्टी और जश्न की पहली पसंद बन गया।

सात समंदर पार से वापस भारत कैसे आया यह सुपरहिट गाना?

भले ही इस गाने को त्रिनिदाद की धरती पर रिकॉर्ड किया गया था, लेकिन इसके बोल और इसकी आत्मा पूरी तरह से भारतीय संस्कृति से ओत-प्रोत थी। यही वजह थी कि इस गाने ने वापस घूमकर अपनी मातृभूमि यानी भारत का रुख किया। भारत में इस गाने को सबसे पहले मशहूर लोक गायिका कल्पना पटवारी ने अपने खास भोजपुरी अंदाज में री-क्रिएट कर देश भर में मशहूर कर दिया। इसके बाद इस गाने की जबरदस्त पॉपुलैरिटी और थिरकाने वाली बीट्स को देखते हुए बॉलीवुड के मशहूर म्यूजिक डायरेक्टर साजिद-वाजिद ने इसे सलमान खान की फिल्म 'दबंग 2' में रीमिक्स वर्जन के तौर पर शामिल किया। अब एक बार फिर 'धमाल 4' में संगीतकार आदित्य देव और सिंगर नीलकमल सिंह के नए और ट्रेंडी म्यूजिक अरेंजमेंट के साथ यह ऐतिहासिक गाना दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर रहा है।

 

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