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बप्पा को क्यों बेहद प्रिय है हरी दूर्वा? प्रद्युम्न चतुर्थी पर 21 दूर्वा चढ़ाने के पीछे छिपा है यह अद्भुत पौराणिक रहस्य

सनातन धर्म में भगवान गणेश की पूजा-अर्चना के बिना किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत नहीं होती है। शास्त्रों के अनुसार, बुद्धि और समृद्धि के दाता भगवान श्री गणेश को चतुर्थी तिथि अत्यंत प्रिय है। इस साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को 'प्रद्युम्न चतुर्थी' (Pradyumna Chaturthi 2026) के रूप में बेहद श्रद्धाभाव के साथ मनाया जा रहा है। इस विशेष दिन पर गणपति बप्पा के 'प्रद्युम्न' रूप की विशेष पूजा-अर्चना और व्रत करने का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, विघ्नहर्ता की कोई भी पूजा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक कि उन्हें हरी दूर्वा (एक विशेष प्रकार की घास) अर्पित न की जाए। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बप्पा को हमेशा 21 की संख्या में ही दूर्वा क्यों चढ़ाई जाती है? आइए जानते हैं इस साल प्रद्युम्न चतुर्थी पर पूजा के महामुहूर्त, दुर्लभ संयोग और इसके पीछे छिपी बेहद रोचक पौराणिक कथा।

कल रखा जाएगा प्रद्युम्न चतुर्थी का व्रत, तिथि और समय का पूरा गणित समझें

वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार, इस वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 17 जून की रात 09:38 बजे से प्रारंभ हो चुकी है और यह 18 जून की शाम 06:58 बजे तक रहने वाली है। सनातन परंपरा में उदया तिथि की महत्ता सर्वोपरि होती है, इसलिए 18 जून 2026 को ही प्रद्युम्न चतुर्थी का व्रत रखा जाएगा और इसी दिन पूजन व दान-पुण्य के कार्य किए जाएंगे। ज्योतिषियों के मुताबिक, इस साल की प्रद्युम्न चतुर्थी बेहद खास है क्योंकि इस दिन गुरु पुष्य योग, सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग और रवि योग का एक बेहद दुर्लभ महासंयोग बन रहा है।

नोट कर लें प्रद्युम्न चतुर्थी पूजा के महामुहूर्त और महासंयोग की समय-सीमा

इस पावन दिन पर बप्पा की कृपा पाने के लिए भक्तों को शुभ मुहूर्त में ही पूजा-अर्चना करनी चाहिए। इस दिन भगवान गणेश की आराधना के लिए सबसे उत्तम मध्याह्न मुहूर्त सुबह 10:45 बजे से शुरू होकर दोपहर 01:30 बजे तक रहने वाला है। इसके अलावा, इस दिन बनने वाले शुभ योगों की समय-सीमा इस प्रकार है:

  • गुरु पुष्य योग: सुबह 05:13 बजे से सुबह 11:32 बजे तक

  • सर्वार्थ सिद्धि योग: सुबह 05:13 बजे से सुबह 11:32 बजे तक

  • अमृत सिद्धि योग: सुबह 05:13 बजे से सुबह 11:32 बजे तक

  • रवि योग: सुबह 05:13 बजे से सुबह 11:32 बजे तक

जब अनलासुर नाम के भयानक राक्षस ने मचाया आतंक, जिंदा निगल जाता था लोगों को

गणेश पुराण में वर्णित एक बेहद रोचक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में अनलासुर नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर राक्षस हुआ करता था। उसने अपने अपार बल और अहंकार के वशीभूत होकर तीनों लोकों में भारी उत्पात मचा रखा था। अनलासुर के पास एक बेहद भयानक शक्ति थी कि वह इंसानों, ऋषि-मुनियों और यहां तक कि देवी-देवताओं को भी जिंदा निगल जाता था। उसके इस भयंकर आतंक से तंग आकर सभी देवी-देवता और ऋषि-मुनि देवों के देव महादेव की शरण में पहुंचे और रक्षा की गुहार लगाई। भगवान शिव ने सभी को सांत्वना देते हुए कहा कि इस भयंकर राक्षस का अंत केवल विघ्नहर्ता गणेश ही कर सकते हैं। इसके बाद सभी देवताओं ने मिलकर भगवान गणेश की कठोर आराधना की।

बप्पा ने जब अनलासुर को सीधे पेट में उतारा, फिर ऋषियों ने दी 21 दूर्वा

देवताओं की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान गणेश प्रकट हुए और उन्होंने अनलासुर राक्षस से भीषण युद्ध किया। युद्ध के अंत में जब राक्षस बप्पा पर भारी पड़ने का प्रयास करने लगा, तो श्री गणेश ने अपना विशाल रूप धारण किया और अनलासुर को जिंदा ही निगल लिया। राक्षस को पेट में निगलते ही उसका वध तो हो गया, लेकिन उसके अग्नि स्वरूप के कारण भगवान गणेश के पेट में असहनीय और भयंकर जलन होने लगी। बप्पा व्याकुल हो उठे और उनका पूरा शरीर तपने लगा।

भगवान गणेश के पेट की इस भयानक तपन को शांत करने के लिए वहां मौजूद कश्यप ऋषि और अन्य विद्वानों ने तुरंत दूर्वा घास मंगवाई और बप्पा को 21 दूर्वा खाने के लिए दी। जैसे ही श्री गणेश ने उन 21 दूर्वाओं को ग्रहण किया, उनके पेट की जलन पूरी तरह शांत हो गई और वे अत्यंत प्रसन्न हुए। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि बप्पा को प्रसन्न करने और उनकी असीम कृपा पाने के लिए भक्त उन्हें श्रद्धापूर्वक 21 दूर्वा अर्पित करते हैं।

 

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