7 साल से पहले बच्चे को अलग कमरे में सुलाने की न करें जिद, पेरेंटिंग एक्सपर्ट से जानें होमवर्क से लेकर खिलौने समेटने की सही उम्र
हर माता-पिता का यह सपना होता है कि उनका बच्चा समय से पहले समझदार हो जाए, अपने काम खुद करने लगे और उसमें बेहतरीन आदतें विकसित हों। लेकिन अक्सर पैरेंट्स अनजाने में बच्चों पर उनकी उम्र से बड़ा दिखने का दबाव बनाने लगते हैं। आधुनिक कूटनीति और समाज की भागदौड़ में हम यह भूल जाते हैं कि बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास की एक प्राकृतिक गति होती है। जानी-मानी पेरेंटिंग एक्सपर्ट अंबिका अग्रवाल के मुताबिक, बच्चों का दिमाग और उनका व्यवहार हर उम्र में अलग-अलग चरणों से गुजरता है। अगर आप सही उम्र में सही बात सिखाएंगे, तो बच्चा बिना किसी डर या मानसिक तनाव के उसे आसानी से अपना लेगा। आइए जानते हैं कि बच्चों के विकास से जुड़े अलग-अलग कामों की सही और सटीक उम्र क्या है।
बचपन की आदतें और पैरेंट्स की जल्दबाजी: क्यों बैकफायर कर सकता है उम्र से पहले का दबाव?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब माता-पिता किसी आदत को लेकर बहुत जल्दी उम्मीदें पाल लेते हैं, तो बच्चे खुद को एक अनचाहे दबाव में पाते हैं। इसका सीधा असर उनके स्वभाव और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। परवरिश का असली नियम यह है कि बच्चे को उसकी उम्र के हिसाब से बढ़ने का मौका दिया जाए। जब बच्चा मानसिक रूप से किसी काम के लिए तैयार होता है, तो वह उसे खुशी-खुशी सीखता है, न कि किसी डर की वजह से।
अलग कमरे में सुलाने का सही समय: 7 साल से पहले न करें जबरदस्ती
अक्सर पश्चिमी देशों की जीवनशैली को देखकर भारतीय पैरेंट्स भी बहुत जल्दी बच्चों को अलग कमरे या बिस्तर पर सुलाने की कोशिश करने लगते हैं। लेकिन पेरेंटिंग कोच अंबिका अग्रवाल के अनुसार, ज्यादातर बच्चे 7 साल की उम्र या इसके बाद ही अकेले सोने के लिए मानसिक और भावनात्मक रूप से तैयार हो पाते हैं। इस उम्र तक आते-आते वे इमोशनली थोड़े मजबूत हो जाते हैं और उनके मन से अकेलेपन का डर कम होने लगता है। अगर आपका बच्चा 7 साल से कम का है और वह आपके साथ ही सोना चाहता है, तो उसे डांटने या उसकी आदत को गलत बताने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। उसे प्यार से समझाएं और धीरे-धीरे उसकी अपनी जगह के लिए सहज बनाएं।
पढ़ाई में एकाग्रता (Concentration): 5-6 साल से पहले एक जगह टिकना क्यों है मुश्किल?
छोटे बच्चों के माता-पिता अक्सर शिकायत करते हैं कि उनका बच्चा पढ़ाई के समय एक जगह टिक कर नहीं बैठता। एक्सपर्ट के मुताबिक, 5 से 6 साल की उम्र से पहले बच्चों का अटेंशन स्पैन यानी ध्यान लगाने की क्षमता बहुत कम होती है। इस उम्र में बच्चे खेल-कूद और हर समय एक्टिव रहकर ही दुनिया को सीखते और समझते हैं। अगर आपका छोटा बच्चा पढ़ते समय बार-बार उठता है या इधर-उधर देखता है, तो इसे उसकी जिद या बदतमीजी समझने की भूल न करें। यह एक बिल्कुल सामान्य व्यवहार है। इस उम्र में उन्हें छोटी-छोटी शिफ्ट में पढ़ाएं और बीच-बीच में खेलने का ब्रेक जरूर दें।
खिलौने और सामान समेटना: 3 से 4 साल की उम्र से डालें जिम्मेदारी की नींव
बच्चों को जिम्मेदार बनाने की शुरुआत बहुत छोटी उम्र से की जा सकती है। जब बच्चा 3 से 4 साल की उम्र में कदम रखता है, तो वह माता-पिता के छोटे और आसान निर्देशों को अच्छी तरह समझने की स्थिति में आ जाता है। यह बिल्कुल सही समय है जब आप उन्हें खेल खत्म होने के बाद अपने खिलौने वापस डिब्बे में रखने की आदत डाल सकते हैं। हां, शुरुआत में बच्चा पूरी तरह से काम परफेक्ट नहीं करेगा, लेकिन आपको उस पर गुस्सा होने के बजाय खुद उसके साथ मिलकर खिलौने समेटने चाहिए। जब भी वह छोटा सा सही कदम उठाए, उसकी जमकर तारीफ करें ताकि उसका उत्साह बढ़े।
होमवर्क में कब कम करें दखल? 7-8 साल की उम्र है आत्मनिर्भर बनाने का सही वक्त
शुरुआती क्लासों में बच्चों को होमवर्क कराने के लिए पैरेंट्स को उनके साथ लगातार बैठना पड़ता है। लेकिन 7 से 8 साल की उम्र में बच्चे अपनी जिम्मेदारियों को खुद समझने के लायक हो जाते हैं। पेरेंटिंग कोच के अनुसार, यह वही समय है जब आपको बच्चे के होमवर्क कराते समय अपनी निर्भरता को थोड़ा कम कर देना चाहिए। हर समय उसके पास बैठने के बजाय उसे खुद से कोशिश करने का मौका दें। अगर वह किसी सवाल पर अटकता है, तो तुरंत उत्तर बताने के बजाय उसे खुद सोचने और दिमाग दौड़ाने के लिए प्रेरित करें। इससे बच्चे का सेल्फ-कॉन्फिडेंस बढ़ेगा और उसकी प्रॉब्लम-सॉल्विंग स्किल्स मजबूत होंगी।
शेयरिंग इज केयरिंग: 4 से 5 साल की उम्र में ही समझ आते हैं दूसरों के इमोशंस
अक्सर 2 या 3 साल के बच्चे अपने खिलौने या खाने की चीजें किसी दूसरे बच्चे के साथ साझा नहीं करना चाहते। कई पैरेंट्स इसे बच्चे का स्वार्थ मान लेते हैं, जो कि पूरी तरह गलत है। एक्सपर्ट अंबिका अग्रवाल बताती हैं कि बच्चे 4 से 5 साल की उम्र के आसपास दूसरों की भावनाओं और शेयरिंग के महत्व को गहराई से समझना शुरू करते हैं। इस उम्र से पहले उनका अपनी चीजों को लेकर पजेसिव होना स्वाभाविक है। उन्हें डांटने के बजाय कहानियों और खेल-खेल के जरिए प्यार से सिखाएं कि अपनी चीजें बांटने से खुशियां बढ़ती हैं। जब वे ऐसा करें, तो उनके इस अच्छे व्यवहार को रिवॉर्ड या सराहना जरूर दें।