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जिंदगी बदल देगी गीता की यह एक बात, मानसिक तनाव और हर चिंता को चुटकियों में दूर करती है भगवान श्रीकृष्ण की यह दिव्य सीख

आज की आधुनिक और बेहद भागदौड़ भरी जिंदगी में शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जो परेशान न हो। कभी ऑफिस के काम का मानसिक दबाव, कभी पारिवारिक रिश्तों की अनबन तो कभी अपने भविष्य को लेकर अनजाना डर और चिंता इंसान के मन को चौबीसों घंटे घेरे रहती है। छोटी-छोटी बातों पर तनाव में आ जाना आज के दौर की सबसे बड़ी समस्या बन चुका है। ऐसे कठिन और भटकाव भरे समय में श्रीमद्भगवद्गीता के अनमोल विचार और भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य ज्ञान इंसान को अंधेरे से निकालकर सही रास्ता दिखाने का काम करता है। कुरुक्षेत्र के मैदान में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिए थे, वे आज सदियों बाद भी हमारे रोजमर्रा के जीवन में उतने ही सटीक और प्रासंगिक बैठते हैं।

परिणाम का डर ही है आपकी सबसे बड़ी कमजोरी

श्रीमद्भगवद्गीता का सबसे प्रसिद्ध और मूल संदेश यही है कि मनुष्य को केवल अपने कर्म पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और उसके परिणाम यानी नतीजे की चिंता में खुद को नहीं डुबाना चाहिए। यह बात सुनने और पढ़ने में जितनी सरल और आसान लगती है, असल जिंदगी के धरातल पर इसे उतारना उतना ही चुनौतीपूर्ण होता है। आज के समय में ज्यादातर लोगों की यह आदत बन चुकी है कि वे किसी काम को शुरू करने से पहले ही उसके फायदे, नुकसान और भविष्य के परिणाम के बारे में ताना-बाना बुनने लगते हैं। जब मेहनत करने के बाद उम्मीद के मुताबिक मनचाहा रिजल्ट नहीं मिलता, तो इंसान गहरे डिप्रेशन और निराशा के दलदल में धंस जाता है।

जब ध्यान सिर्फ कर्तव्य पर होगा, तभी मिलेगा मानसिक सुकुन

भगवान श्रीकृष्ण का स्पष्ट संदेश है कि यदि आपका पूरा ध्यान केवल आपकी मेहनत, ईमानदारी और आपके कर्तव्य पर रहेगा, तो आपका मन हमेशा शांत और स्थिर रहेगा। जब मन शांत होता है, तो आपके काम की गुणवत्ता और परफॉर्मेंस खुद-ब-खुद बहुत बेहतर हो जाती है। इसके विपरीत, जब इंसान हर पल इसी उधेड़बुन में लगा रहता है कि आगे क्या होगा, समाज या लोग क्या कहेंगे, या मुझे इस काम में सफलता मिलेगी भी या नहीं, तब उसका ध्यान अपने वर्तमान काम से पूरी तरह भटक जाता है। यही भटकाव उसकी असफलता का सबसे बड़ा कारण बनता है।

छात्र हो या नौकरीपेशा, हर किसी के लिए जरूरी है यह लाइफ लेसन

रोजमर्रा की जिंदगी के उदाहरणों से समझें तो यह बात शत-प्रतिशत सच साबित होती है। यदि कोई छात्र पढ़ाई करते समय सिर्फ परीक्षा के अंकों या फेल होने के डर के बारे में सोचता रहेगा, तो वह अपनी पढ़ाई पर फोकस नहीं कर पाएगा। ठीक इसी तरह, कॉर्पोरेट जगत या नौकरी करने वाला कोई व्यक्ति अगर हर समय सिर्फ प्रमोशन और सैलरी बढ़ने की चिंता में घुला रहेगा, तो वह अपने मौजूदा प्रोजेक्ट को बेहतर ढंग से पूरा नहीं कर सकेगा। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि मनुष्य अपना शत-प्रतिशत ध्यान उसी काम पर लगाए जो इस समय वर्तमान में उसके सामने है।

जल्दबाजी के इस दौर में धैर्य रखना सिखाती है गीता

आज के इस 'इंस्टेंट' युग में हर किसी को तुरंत और रातों-रात सफलता चाहिए। लोग चाहते हैं कि वे आज मेहनत करें और कल ही उन्हें उसका बड़ा फल मिल जाए। लेकिन हकीकत यह है कि जीवन हमेशा हमारी इच्छाओं और उम्मीदों के हिसाब से नहीं चलता। कई बार सही और बड़े परिणाम आने में लंबा समय लगता है। ऐसे समय में गीता हमें धैर्य (Patience) रखना सिखाती है। विकट परिस्थितियों में भी खुद पर नियंत्रण रखना, धैर्य बनाए रखना और निरंतर बिना रुके मेहनत करते जाना ही जीवन में कामयाबी का एकमात्र और सबसे सही रास्ता माना गया है।

 

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