ट्रंप की राह में कांटों की फसल: आखिर ईरान के साथ 'जंग वाले जिन्न' को बोतल में बंद करना क्यों है नामुमकिन?
डोनल्ड ट्रंप के लिए ईरान एक ऐसी गुत्थी बन चुका है जिसे सुलझाना सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति का काम नहीं, बल्कि जटिल भू-राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक जाल को सुलझाने जैसा है। ट्रंप अक्सर आक्रामक तेवर अपनाते हैं, लेकिन ईरान के मामले में उनके सामने कुछ ऐसी बाधाएं हैं, जो 'जंग वाले जिन्न' को तुरंत बोतल में बंद करने की राह में दीवार बनकर खड़ी हैं।
1. ईरानी प्रॉक्सी नेटवर्क का मायाजाल
ईरान केवल अपने सैन्य बल पर निर्भर नहीं है। मध्य पूर्व के कई देशों में फैले उसके प्रॉक्सी (जैसे लेबनान में हिज़बुल्लाह, यमन में हूती, और इराक/सीरिया में सक्रिय मिलिशिया) ईरान की सुरक्षा ढाल हैं। अगर अमेरिका ईरान पर कोई सीधा दबाव बनाता है, तो ये समूह तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं। ट्रंप चाहकर भी इन छद्म संगठनों को नजरअंदाज नहीं कर सकते, क्योंकि ये पूरे क्षेत्र में अमेरिकी हितों और उसके सहयोगियों (विशेषकर इज़राइल) के लिए कभी न खत्म होने वाला खतरा बने हुए हैं।
2. परमाणु कार्यक्रम का 'पॉइंट ऑफ नो रिटर्न'
ट्रंप के पिछले कार्यकाल के दौरान 'JCPOA' (परमाणु समझौता) से अमेरिका का हटना एक बड़े मोड़ पर खड़ा हो गया था। आज ईरान अपनी परमाणु क्षमता और संवर्धन (enrichment) के मामले में उस बिंदु के बहुत करीब है, जिसे 'पॉइंट ऑफ नो रिटर्न' कहा जाता है। ईरान के लिए यह उसकी 'अस्तित्व की सुरक्षा' का मुद्दा बन चुका है। वह किसी भी हाल में अपनी इस शक्ति को नहीं छोड़ेगा, और कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान को रातों-रात परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
3. रूस और चीन का 'सुरक्षा कवच'
भू-राजनीतिक समीकरण अब पहले से कहीं ज्यादा बदल चुके हैं। ईरान अब अकेला नहीं है। रूस और चीन के साथ उसका सामरिक और आर्थिक गठजोड़ काफी मजबूत हो गया है। अमेरिका अगर ईरान पर कड़े प्रतिबंध या सैन्य कार्रवाई की सोचता है, तो उसे रूस और चीन की मुखालफत का सामना करना पड़ता है। ये देश ईरान को तेल निर्यात और सैन्य तकनीक के जरिए ऑक्सीजन देते रहते हैं, जिससे अमेरिका की 'अधिकतम दबाव' (Maximum Pressure) की नीति अक्सर विफल हो जाती है।
4. इजराइल और क्षेत्रीय सहयोगियों की उम्मीदें
ट्रंप की ईरान नीति को इजराइल और खाड़ी के कुछ देश (जैसे सऊदी अरब) किस नजरिए से देखते हैं, यह बहुत महत्वपूर्ण है। अगर ट्रंप ईरान के प्रति नरम रुख अपनाते हैं, तो उन्हें अपने सबसे करीबी सहयोगी इजराइल के साथ तनाव झेलना पड़ेगा। वहीं, ईरान खुद को एक 'क्षेत्रीय महाशक्ति' के रूप में देखता है और किसी भी विदेशी दबाव के आगे झुकने से वह घरेलू राजनीति में अपनी पकड़ खो सकता है। इसलिए, ईरान का नेतृत्व भी किसी भी समझौते को 'आत्मसमर्पण' की तरह नहीं दिखा सकता।
5. घरेलू राजनीति की जटिलताएं
खुद अमेरिका में भी ईरान को लेकर आम सहमति का अभाव है। एक तरफ कट्टरपंथी हैं जो सैन्य कार्रवाई चाहते हैं, तो दूसरी तरफ वे हैं जो चाहते हैं कि अमेरिका मध्य पूर्व के युद्धों से बाहर निकले और अपनी अर्थव्यवस्था पर ध्यान दे। ट्रंप के लिए ईरान के मुद्दे को जल्द निपटाना इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि कोई भी ठोस समाधान निकालने के लिए लंबे समय तक कूटनीतिक धैर्य और जोखिम लेने की जरूरत है, जबकि राजनीति में त्वरित परिणामों का दबाव हमेशा बना रहता है।