झारखंड के राजनीतिक गलियारों में छिड़ी तीखी जंग, बीजेपी और जेएमएम आमने-सामने
खनिजों से समृद्ध और आदिवासी बहुल राज्य झारखंड की राजनीति एक बार फिर से बेहद रोमांचक और संघर्षपूर्ण मोड़ पर आ खड़ी हुई है। राज्य के राजनीतिक क्षितिज पर जैसे-जैसे आगामी राजनीतिक गतिविधियों और चुनावी सुगबुगाहटों का दौर तेज हो रहा है, वैसे-वैसे सत्ताधारी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच जुबानी जंग और राजनीतिक पैंतरेबाजी अपने चरम पर पहुंच गई है। विपक्षी दल बीजेपी ने आक्रामक रुख अपनाते हुए हेमंत सरकार से वर्ष 2019 से लेकर अब तक के कार्यकाल का पूरा कच्चा-चिट्ठा और विकास कार्यों का हिसाब मांगना शुरू कर दिया है। दूसरी तरफ, सत्ताधारी जेएमएम और उसके सहयोगी दल भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं और उन्होंने पलटवार करते हुए राज्य में घुसपैठियों के मुद्दों और स्थानीय अस्मिता का कार्ड खेल कर सियासी तापमान को अचानक बहुत ऊपर कर दिया है। इस हाई-वोल्टेज ड्रामे के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब राजनीतिक दलों के बीच सीधा मुकाबला और असली भिड़ंत में अभी समय बाकी है, तो राज्य की फिजा में यह सियासी गर्मी इतनी जल्दी क्यों घुलने लगी है और इसके पीछे दोनों दलों की क्या बड़ी रणनीतिक चालें छिपी हुई हैं।
बीजेपी का आक्रामक हमला: 2019 से लेकर अब तक के कामकाज पर मांगा जा रहा जवाब
भारतीय जनता पार्टी ने झारखंड में अपनी संगठनात्मक पकड़ को और अधिक मजबूत करते हुए राज्य की हेमंत सोरेन सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पार्टी के नए प्रभारियों और वरिष्ठ नेताओं ने राजधानी रांची में आक्रामक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सरकार पर भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था की बदहाली, खनन घोटाले और बेरोजगारी जैसे गंभीर आरोप मढ़े हैं। बीजेपी का सीधा कहना है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान राज्य में जल, जंगल और जमीन की बड़े पैमाने पर लूट हुई है तथा आम जनता से जो वादे साल 2019 के चुनावों में किए गए थे, वे पूरी तरह से कागजी साबित हुए हैं। विपक्षी दल का यह रणनीतिक दबाव इस बात पर केंद्रित है कि जनता के सामने सरकार के पिछले कार्यकाल का एक 'प्रोग्रेस रिपोर्ट कार्ड' पेश किया जाए ताकि यह साबित किया जा सके कि शासन के मोर्चे पर वर्तमान सरकार पूरी तरह विफल रही है। बीजेपी के इस चौतरफा हमले ने प्रशासनिक तंत्र और सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि हर मोर्चे पर सरकार को घेरने की यह रणनीति आने वाले दिनों में और अधिक तेज होने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं।
जेएमएम का पलटवार: घुसपैठियों और स्थानीय अधिकारों के दांव से धारदार हुई सियासत
भारतीय जनता पार्टी के इन तीखे हमलों का जवाब देने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा ने भी अपने तरकश से सबसे धारदार तीर बाहर निकाल लिए हैं और 'घुसपैठियों' तथा राज्य की जनसांख्यिकी (Demography) में बदलाव जैसे संवेदनशील मुद्दों को हवा देनी शुरू कर दी है। सत्ताधारी दल का यह तर्क है कि केंद्रीय एजेंसियां और विपक्षी दल मिलकर राज्य की चुनी हुई लोकप्रिय आदिवासी सरकार को अस्थिर करने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। जेएमएम के नेताओं का कहना है कि बीजेपी के पास विकास का कोई ठोस मुद्दा नहीं बचा है, इसलिए वे राज्य के मूलवासियों और आदिवासियों के बीच भ्रम फैलाने के लिए ध्रुवीकरण और बाहरी मुद्दों का सहारा ले रहे हैं। इस प्रकार के आक्रामक बयानों और काउंटर-आरोपियों के जरिए जेएमएम अपने पारंपरिक आदिवासी वोट बैंक को यह समझाने का प्रयास कर रहा है कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और जल-जंगल-जमीन की रक्षा केवल वर्तमान सरकार ही कर सकती है, जिससे चुनावी पिच पर दोनों तरफ से जबरदस्त रस्साकशी देखने को मिल रही है।
क्यों छिड़ी है अभी से यह सियासी जंग? क्या हैं इसके दूरगामी राजनीतिक मायने?
राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि झारखंड के राजनीतिक पटल पर अभी से शुरू हुई इस '29 वाली फाइट' या शुरुआती भिड़ंत के पीछे असल मकसद वैचारिक और मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करना है। जब चुनाव में अभी काफी वक्त बाकी हो और दोनों दल इतनी आक्रामक शैली में मैदान में उतर जाएं, तो इसका मतलब साफ होता है कि वे मतदाता के मन में अपनी कहानी (Narrative) को सबसे पहले स्थापित करना चाहते हैं। बीजेपी जहां सुशासन, भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन और विकास के एजेंडे को धार देकर सत्ता परिवर्तन की जमीन तैयार करने में जुटी है, वहीं जेएमएम क्षेत्रीय अस्मिता, स्थानीय अधिकारों और केंद्रीय दखलंदाजी के विरोध का कार्ड खेलकर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। आने वाले हफ्तों में यह राजनीतिक टकराव और अधिक तीखा होने की पूरी उम्मीद है, क्योंकि झारखंड की इस खनिजों से भरी धरती पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दल अपनी पूरी ताकत झोंकने से पीछे नहीं हटेंगे।