JCERT की बड़ी लापरवाही पर भड़के जाने-माने लेखक अभिरंजन कुमार
साहित्यिक जगत और शैक्षणिक संस्थानों के बीच इन दिनों कॉपीराइट के उल्लंघन और बौद्धिक संपदा अधिकारों (Intellectual Property Rights) को लेकर एक बहुत बड़ा विवाद खड़ा हो गया है, जिसने प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है। देश के जाने-माने और प्रतिष्ठित लेखक तथा कवि अभिरंजन कुमार (Abhiranjan Kumar) की एक प्रसिद्ध कविता को झारखंड शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (JCERT) द्वारा बिना किसी पूर्व अनुमति, बिना लेखक की सहमति और बिना किसी कॉपीराइट अनुबंध के सीधे स्कूली पाठ्यपुस्तकों में छाप लिया गया है। जब इस गंभीर लापरवाही की जानकारी लेखक अभिरंजन कुमार को मिली, तो उन्होंने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए JCERT के इस गैर-कानूनी और मनमाने रवैये के खिलाफ बेहद तीखा रुख अपनाया है। लेखक ने संस्थान को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि निर्धारित समय के भीतर इस कॉपीराइट उल्लंघन पर उचित स्पष्टीकरण और कानूनी मुआवजा नहीं दिया गया, तो वे इस मामले में अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे और सख्त कानूनी कार्रवाई करेंगे। इस हाई-प्रोफाइल साहित्यिक विवाद के सामने आने के बाद से शिक्षा विभाग और पाठ्यपुस्तक निर्माण समितियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, और हर तरफ इसी बात की चर्चा हो रही है कि आखिर जिम्मेदार अधिकारियों की इतनी बड़ी चूक कैसे हो सकती है।
साहित्यिक चोरी और कॉपीराइट नियमों की खुली धज्जियां, बिना पूछे रचना छापने से आहत हुए रचनाकार अभिरंजन कुमार
कॉपीराइट कानून और बौद्धिक संपदा अधिकारों के तहत किसी भी लेखक की रचना, कविता या लेख को उसकी लिखित अनुमति के बिना व्यवसायिक या शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए उपयोग करना एक दंडनीय अपराध माना जाता है। इस मामले में लेखक अभिरंजन कुमार ने स्पष्ट किया है कि उनकी अनुमति के बिना पाठ्यपुस्तक में कविता का प्रकाशन न केवल उनके मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है, बल्कि यह रचनाकारों के प्रति अकादमिक संस्थानों की उदासीनता और तानाशाही रवैये को भी उजागर करता है। जब एक तरफ देश भर के लेखक अपनी कला और बौद्धिक संपदा की सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं राज्य स्तर के सरकारी शैक्षिक संस्थान ही यदि इस प्रकार की मनमानी करने लगेंगे, तो साहित्य जगत का भविष्य कैसे सुरक्षित रहेगा। इस घटना के बाद देश भर के तमाम बड़े लेखकों, कवियों और साहित्यिक संगठनों ने अभिरंजन कुमार का खुला समर्थन करना शुरू कर दिया है और जेसीईआरटी (JCERT) की इस लचर व्यवस्था की जमकर आलोचना की जा रही है। जानकारों का कहना है कि सरकारी प्रकाशनों में इस प्रकार की लापरवाही यह दर्शाती है कि पाठ्य पुस्तकों के संकलन के दौरान नियमों का पालन करने में कितनी बड़ी लापरवाही बरती जाती है।
JCERT की साख पर लगा बट्टा, कानूनी नोटिस के बाद शिक्षा विभाग में मचा हड़कंप और शुरू हुआ लीपापोती का दौर
जैसे ही लेखक अभिरंजन कुमार की तरफ से कानूनी कार्रवाई की चेतावनी और नोटिस का मामला मीडिया और सार्वजनिक पटल पर आया, झारखंड शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (JCERT) के अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। आनन-फानन में इस गलती को सुधारने और मामले को रफा-दफा करने के लिए विभागीय स्तर पर बैठकों का दौर शुरू हो गया है, क्योंकि किसी भी बड़े लेखक के साथ कानूनी विवाद में फंसना संस्थान की छवि को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। शिक्षा विभाग के जानकारों का मानना है कि इस प्रकार के मामलों में आमतौर पर संपादकीय टीम और पाठ्यपुस्तक विकास समिति की जिम्मेदारी होती है कि वे किसी भी पाठ को शामिल करने से पहले उसके कॉपीराइट धारक से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) प्राप्त करें, लेकिन इस प्रकरण में उस बुनियादी प्रक्रिया को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि जेसीईआरटी इस कानूनी पेंच से बाहर निकलने के लिए कौन सा रास्ता अपनाती है और क्या वे सार्वजनिक रूप से अपनी गलती स्वीकार करते हुए लेखक को उचित मानदेय व मुआवजा देते हैं या मामला अदालत तक पहुंचता है।