पदों का अहंकार और दिखावे का पर्दाफाश! नौकरी जाने के बाद इस शख्स को मिले ऐसे सबक, हर नौकरीपेशा को जानना चाहिए
कॉरपोरेट नौकरी (Corporate Job) बाहर से जितनी सुरक्षित और शानदार दिखाई देती है, अंदर से उतनी ही मुश्किलों से भरी होती है. अच्छी सैलरी, बड़ी कंपनी (Big Company), टीम और बड़ी जिम्मेदारियों के बीच अक्सर इंसान को यह भ्रम हो जाता है कि उसका करियर अब पूरी तरह पटरी पर है. लेकिन एक सिंगल ईमेल या अचानक बुलाई गई मीटिंग पलभर में पूरी तस्वीर बदलकर रख देती है.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर 'मिडिल एज रीबूट' (Midlife Reboot) अकाउंट से जुड़े एक अनुभवी शख्स ने अपनी आपबीती शेयर की है, जो आज के दौर में हर कॉरपोरेट पेशेवर के लिए एक आईना है. करीब 18 साल तक कॉरपोरेट सेक्टर में लीडरशिप भूमिका निभाने के बाद उन्हें 40 की उम्र के पड़ाव पर लेऑफ (Layoff) का सामना करना पड़ा. शुरुआत में यह झटका बेहद मानसिक तनाव देने वाला था, लेकिन समय बीतने के साथ उन्होंने महसूस किया कि इस घटना ने उन्हें जिंदगी को एक नए और बेहतर नजरिए से देखने का अवसर दिया है.
नौकरी छूटते ही सामने आ गई रिश्तों की असली सच्चाई
लेऑफ के बाद जिंदगी में आने वाला सबसे बड़ा बदलाव सिर्फ बैंक खाते के बैलेंस तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आसपास के लोगों का बर्ताव भी तेजी से बदल जाता है. इस कॉरपोरेट लीडर ने अपने वीडियो में बताया कि नौकरी जाने के बाद उन्हें यह साफ समझ आ गया कि कौन लोग उनके सच्चे शुभचिंतक हैं और कौन सिर्फ पद, रुतबे और काम की वजह से उनके आसपास थे.
मुश्किल वक्त में जो लोग बिना किसी स्वार्थ के फोन करते हैं, हालचाल पूछते हैं या मिलने बुलाते हैं, वही आपके असली दोस्त होते हैं. इसके विपरीत, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो नौकरी जाने की खबर सुनकर सिर्फ एक फॉर्मेलिटी वाला मैसेज भेजकर हमेशा के लिए गायब हो जाते हैं. यह अनुभव भले ही कड़वा और कठिन था, लेकिन इसने रिश्तों को लेकर जीवन में एक जरूरी क्लैरिटी जरूर ला दी. जब नाम के आगे से कंपनी और पद का टैग हट जाता है, तब असलियत सामने आती है.
सैलरी रुकते ही समझ आया दिखावे और जरूरत का फर्क
नौकरी के दौरान जब हर महीने तय तारीख पर सैलरी क्रेडिट होती है, तब कई तरह के खर्च बहुत सामान्य लगने लगते हैं. महंगी डाइनिंग, ऑनलाइन शॉपिंग, बिना काम के सब्सक्रिप्शन और लाइफस्टाइल से जुड़ी अन्य चीजें धीरे-धीरे जीवनशैली का हिस्सा बन जाती हैं. लेकिन जैसे ही इनकम का जरिया बंद होता है, खर्चों को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल जाता है.
इस शख्स के अनुसार, लेऑफ उनके लिए एक प्रकार का फाइनेंशियल रियलिटी चेक साबित हुआ. उन्हें पहली बार समझ आया कि असल जरूरत क्या है और वे कौन सी चीजें हैं जो सिर्फ दिखावे या आदत के कारण खरीदी जा रही थीं. उन्हें यह अहसास हुआ कि केवल बड़ी सैलरी होना ही वित्तीय सुरक्षा (Financial Security) नहीं है, बल्कि असली सुरक्षा इस बात में है कि यदि कुछ महीनों तक आमदनी ना भी हो, तब भी जीवन सुचारू रूप से चल सके.
टूट गया कॉरपोरेट सिक्योरिटी का भ्रम और बदला नजरिया
लेऑफ के बाद उन्हें अपने करियर को लेकर सबसे बड़ा और गहरा सबक मिला. लंबे समय तक कॉरपोरेट में टिके रहने के बाद लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है कि उनकी कंपनी और नौकरी स्थायी सुरक्षा की गारंटी देती है. लेकिन छंटनी ने इस मिथक को पूरी तरह तोड़ दिया.
उन्हें यह बात समझ आई कि कॉरपोरेट वर्ल्ड में कोई भी पद या नौकरी कभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं होती है. कंपनी की बिजनेस स्ट्रैटेजी बदल सकती है, पूरी टीम बंद हो सकती है, या बिजनेस मॉडल में बदलाव आ सकता है, जिसके चलते सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाला कर्मचारी भी लेऑफ की गाज का शिकार बन सकता है. इस सच्चाई ने उनके काम करने के अंदाज को भी बदल दिया. इसके बाद जब उन्होंने दोबारा लीडरशिप रोल संभाला, तो ऑफिस की छोटी-मोटी और बेमतलब की समस्याओं पर तनाव लेना पूरी तरह बंद कर दिया.
ऑफिस की छोटी बातों पर तनाव लेना हुआ अतीत की बात
नौकरी जाने के बाद जीवन की प्राथमिकताएं अपने आप बदल जाती हैं. पहले जहां ऑफिस की डेडलाइन, टारगेट, मीटिंग्स और इंटरनल पॉलिटिक्स बहुत बड़ी और भारी-भरकम चीजें लगती थीं, वहीं बाद में यह एहसास हुआ कि इन सब चीजों से कहीं ऊपर आपकी अपनी मानसिक शांति और जिंदगी है.
उन्होंने इस पूरे अनुभव को 'एग्जीक्यूटिव रीसेट' (Executive Reset) का नाम दिया. यह एक ऐसा अनिवार्य ब्रेक साबित हुआ जिसने उन्हें सोचने पर मजबूर किया कि आखिर वे किस अंधी दौड़ के पीछे भाग रहे थे. इस दौरान उन्हें यह क्लैरिटी मिली कि करियर बेशक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन पूरा जीवन सिर्फ करियर नहीं है. परिवार, करीबी दोस्त, सेहत, सेविंग्स और खुद के लिए वक्त निकालना भी उतना ही ज्यादा जरूरी है.
लेऑफ को सिर्फ नुकसान मानना गलत, यह हो सकती है नई शुरुआत
किसी भी व्यक्ति के लिए नौकरी छूटना मानसिक और आर्थिक रूप से आसान अनुभव नहीं होता है. सिर पर ईएमआई (EMI), परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियां और भविष्य को लेकर अनिश्चितता ऐसे समय में एंग्जाइटी को बढ़ा सकती हैं. हर इंसान की आर्थिक स्थिति अलग होती है, इसलिए लेऑफ के सकारात्मक पहलू हर किसी पर एक जैसे लागू नहीं हो सकते.
इसके बावजूद, इस शख्स की कहानी हमें यह सिखाती है कि जिंदगी का सबसे बड़ा झटका कभी-कभी इंसान को उन पहलुओं पर विचार करने का मौका देता है, जिनके लिए व्यस्त नौकरी में कभी समय ही नहीं मिलता था. 40 साल की उम्र में करियर की दिशा बदलना डरावना लग सकता है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि नौकरी का अंत जिंदगी का अंत है. कई बार यही कठिन पड़ाव एक बेहतर और नई शुरुआत का दरवाजा खोल देता है.