सरकारी फाइलों का कबाड़ बेचकर शिक्षा विभाग ने कर डाली छप्परफाड़ कमाई: कमाए...

सरकारी फाइलों का कबाड़ बेचकर शिक्षा विभाग ने कर डाली छप्परफाड़ कमाई: कमाए...

भारतीय सरकारी कार्यालयों और प्रशासनिक महकमों में लालफीताशाही और फाइलों के अंबार के बीच अक्सर यह देखने को मिलता है कि सालों-साल पुराने रिकॉर्ड रूम कचरे और धूल फांकते रहते हैं। लेकिन इन सबके बीच उत्तर प्रदेश या देश के किसी अन्य प्रमुख राज्य के शिक्षा विभाग (Education Department) ने एक ऐसा अनूठा, क्रांतिकारी और प्रेरणादायक कदम उठाया है, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र को हैरान कर दिया है। शिक्षा विभाग ने अपने दफ्तरों में बरसों से धूल फांक रही पुरानी, बेकार और अनुपयोगी सरकारी फाइलों व कबाड़ को बेचकर एक या दो नहीं बल्कि पूरे 6.89 करोड़ रुपये की शानदार कमाई कर डाली है। इस अभियान की सबसे हैरान करने वाली और सुखद बात यह है कि इस कबाड़ के हटने से दफ्तरों में एक ही बार में लगभग 19 फुटबॉल मैदानों (Football Fields) के बराबर विशाल और बहुमूल्य जगह खाली हो गई है, जिसका इस्तेमाल अब सकारात्मक और रचनात्मक कार्यों के लिए किया जा सकेगा। आइए इस विस्तृत रिपोर्ट में जानते हैं कि इस मेगा स्वच्छता और कबाड़ निस्तारण अभियान को किस प्रकार अंजाम दिया गया और इससे प्रशासन को क्या-क्या बड़े लाभ हुए हैं।

क्या है इस मेगा स्वच्छता अभियान की पूरी कहानी और कैसे आया फाइलों को बेचने का यह अनोखा विचार?

सरकारी महकमों में डिजिटलाइजेशन और ई-ऑफिस (E-Office) प्रणाली को बढ़ावा देने के बाद से यह लगातार महसूस किया जा रहा था कि दशकों पुरानी फाइलों के कागजात केवल दफ्तरों के कमरों को घेरे हुए हैं और किसी भी काम के नहीं बचे हैं। 'स्वच्छ भारत अभियान' और प्रशासन में पारदर्शिता तथा सुगमता लाने के विशेष निर्देशों के तहत शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों ने यह बीड़ा उठाया कि वे अपने तमाम जिला मुख्यालयों, बेसिक शिक्षा कार्यालयों, माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और निदेशालय के गोदामों में पड़े रद्दी कागजों और बेकार फाइलों का विधिवत और पारदर्शी तरीके से निस्तारण करेंगे। एक बड़े स्तर पर विशेष अभियान चलाकर जब इन तमाम पुराने दस्तावेजों की छंटनी की गई, तो टन के हिसाब से पुराना कबाड़ और फाइलें बाहर निकल आईं। नियमों के तहत पूरी पारदर्शिता बरतते हुए ई-ऑक्शन (E-Auction) और सरकारी स्क्रैप वेंडर्स के माध्यम से इस कबाड़ को बेचा गया, जिसके परिणामस्वरूप विभाग के खाते में 6.89 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि जमा हो गई।

19 फुटबॉल मैदान जितनी विशाल जगह खाली: अब होगा दफ्तरों का कायाकल्प और नया उपयोग

इस अभियान का सबसे बड़ा और सकारात्मक पहलू केवल पैसे कमाना नहीं रहा, बल्कि उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण वह भारी-भरकम जगह है जो इन बेकार फाइलों के हटने से मुक्त हुई है। शिक्षा विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, जब सभी जिलों से पुराने गोदामों और कमरों को खाली कराया गया, तो कुल मिलाकर इतनी अधिक जगह बाहर आई जो क्षेत्रफल के हिसाब से लगभग 19 बड़े फुटबॉल मैदानों के बराबर बैठती है। अब तक स्थिति यह थी कि नए रिकॉर्ड रखने या आधुनिक लैब और पुस्तकालय बनाने के लिए जगह की भारी किल्लत महसूस होती थी, लेकिन इन गोदामों के खाली होने से अब शिक्षा विभाग के पास अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करने के लिए असीम संभावनाएं मिल गई हैं। खाली हुई इन जमीनों और कमरों में अब आधुनिक स्मार्ट क्लासेज, डिजिटल लाइब्रेरी, शिक्षकों के लिए ट्रेनिंग सेंटर और बालिकाओं के लिए विशेष सुविधाओं वाले कक्षों का निर्माण किया जा सकेगा, जिससे पूरे शिक्षा तंत्र की कार्यशैली में एक अभूतपूर्व सुधार देखने को मिलेगा।

पारदर्शी तरीके से हुआ निस्तारण और भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार: सरकार की इस पहल की हो रही है हर तरफ तारीफ

जब भी सरकारी सामान या कबाड़ बेचने की बात आती है, तो अक्सर पारदर्शिता को लेकर कई तरह के सवाल उठते रहे हैं, लेकिन शिक्षा विभाग ने इस पूरी प्रक्रिया को पूरी तरह से डिजिटल और पारदर्शी रखा। सरकारी ई-बाजार (GeM) और पारदर्शी ई-निविदा प्रक्रिया (E-Tender) के जरिए कचरे और रद्दी के इस व्यापार को अंजाम दिया गया ताकि एक-एक पाई का हिसाब पूरी तरह से साफ रहे। प्राप्त हुए 6.89 करोड़ रुपये को राज्य के शिक्षा और छात्र कल्याण से जुड़ी विभिन्न विकासात्मक योजनाओं में पुनः निवेश किया जाएगा। इस सराहनीय पहल को देखकर अब राज्य के अन्य विभागों जैसे राजस्व, लोक निर्माण विभाग (PWD) और चिकित्सा विभाग ने भी इस मॉडल को अपनाने की सुगबुगाहट शुरू कर दी है, ताकि उनके यहां भी धूल फांक रहे पुराने रिकॉर्ड रूम को खाली करके राजस्व जुटाया जा सके।

प्रशासनिक सुधार की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा यह अनूठा कदम

शिक्षा विभाग द्वारा उठाया गया यह कदम यह साबित करता है कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो और अधिकारियों में कुछ नया करने का जज्बा हो, तो प्रशासनिक व्यवस्था में बिना किसी अतिरिक्त बजट के भी बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। सालों से बेकार पड़ी फाइलों को ठिकाने लगाकर जहां एक तरफ सरकारी दफ्तरों को साफ-सुथरा और हवादार बनाया गया है, वहीं दूसरी तरफ करोड़ों रुपए का राजस्व अर्जित करके यह दिखा दिया गया है कि 'कचरे से कंचन' कैसे बनाया जाता है। देश भर के अन्य प्रशासनिक निकायों के लिए यह एक बेहतरीन केस स्टडी बन गई है कि कैसे छोटे-छोटे और व्यावहारिक कदम उठाकर शासन प्रणाली को अधिक चुस्त, दुरुस्त और जनोपयोगी बनाया जा सकता है।