वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा

पौराणिक एवं प्रचलित वट सावित्री व्रत कथा इस प्रकार है : राजर्षि अश्वपति की एकमात्र संतान थीं सावित्री। सावित्री ने वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पति रूप में चुना।

सनातन परंपरा के अनुसार हर साल ज्येष्ठ मास की अमावस्या को सुहागिनों द्वारा वट सावित्री व्रत का पर्व मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु व डालियों व पत्तियों में भगवान शिव का वास होता है। इस व्रत में महिलाएं वट वृक्ष की पूजा कर सती सावित्री की कथा का श्रवण व वाचन कर अखंड सौभाग्य का फल प्राप्त करती हैं।

पौराणिक एवं प्रचलित वट सावित्री व्रत कथा इस प्रकार है : राजर्षि अश्वपति की एकमात्र संतान थीं सावित्री। सावित्री ने वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पति रूप में चुना। लेकिन जब नारद जी ने उन्हें बताया कि सत्यवान अल्पायु हैं। नारद जी के बताने पर भी सावित्री अपने निर्णय से डिगी नहीं। वह समस्त राजवैभव त्याग कर सत्यवान के साथ उनके परिवार की सेवा करते हुए वन में निवास करने लगीं। जल्द ही सत्यवान का महाप्रयाण का दिन भी आ गया।

सत्यवान अपने महाप्रयाण के दिन जंगल में लकड़ियां काटने गए और वहीँ पर मू्च्छिछत होकर गिर पड़े। तीन दिन से उपवास में रह रही सावित्री उस घड़ी को जानती थीं। उसे तो नारद जी ने पहले ही होनी से अवगत करा दिया था। उसी समय उसी समय सावित्री ने देखा कि अनेक यमदूतों के साथ यमराज आ पहुंचे है। सत्यवान के जीव को दक्षिण दिशा की ओर लेकर जा रहे हैं। यह देख सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल देती हैं। बिना विकल हुए सावित्री ने यमराज से सत्यवान के प्राण न लेने की प्रार्थना की, लेकिन यमराज नहीं माने। सावित्री भी निर्भीक होकर उनके पीछे-पीछे चलने लगी।

यमराज ने सावित्री को कई बार मना किया कि वह उनके साथ न आये। यमराज ने कहा कि- हे पतिव्रता नारी! पृथ्वी तक ही पत्नी अपने पति का साथ देती है। अब तुम वापस लौट जाओ। उनकी इस बात पर सावित्री ने कहा- जहां मेरे पति रहेंगे मुझे उनके साथ रहना है। यही मेरा पत्नी धर्म है। सावित्री के मुख से यह उत्तर सुन कर यमराज बहुत प्रसन्न हुए और कोई तीन वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने सत्यवान के दृष्टिहीन माता-पिता के नेत्रों की ज्योति मांगी, उनका छिना हुआ राज्य मांगा और अपने लिए सौ पुत्रों का वरदान मांगा। तथास्तु कहने के बाद यमराज समझ गए कि सावित्री के पति को साथ ले जाना अब संभव नहीं। इसलिए उन्होंने सावित्री को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद दिया और सत्यवान को छोड़कर वहां से अंतर्धान हो गए।

सावित्री पुन: उसी वट वृक्ष के पास लौट आई। जहां सत्यवान मृत पड़ा था। सत्यवान के मृत शरीर में फिर से संचार हुआ। इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रता व्रत के प्रभाव से न केवल अपने पति को पुन: जीवित करवाया बल्कि सास-ससुर को नेत्र ज्योति प्रदान करते हुए उनके ससुर को खोया राज्य फिर दिलवाया। उसी समय से सावित्री वट व्रत की पूजा की प्रथा शुरू हुई।

चूंकि उस समय सावित्री अपने पति को गोंद में लेकर वट वृक्ष के नीचे ही बैठी थीं, इसीलिए इस दिन महिलाएं अपने परिवार और पति की दीर्घायु की कामना करते हुए वट वृक्ष को भोग अर्पण कर उस पर धागा लपेट कर पूजा करती हैं। यह व्रत करने से सौभाग्यवती महिलाओं की मनोकामना पूर्ण होती है और उनका सौभाग्य अखंड रहता है। कथा का सार यह है कि एकनिष्ठ पतिपरायणा स्त्रियां अपने पति और परिवार को सभी दुख और कष्टों से दूर रखने में समर्थ होती है।

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