508 किमी का सफर, हवा से बातें करेगी देश की पहली बुलेट ट्रेन! जानिए क्यों है ये इतनी खास

508 किमी का सफर, हवा से बातें करेगी देश की पहली बुलेट ट्रेन! जानिए क्यों है ये इतनी खास

देश में हाई-स्पीड रेल यात्रा का सपना अब धरातल पर उतरने के बेहद करीब पहुंच चुका है। मुंबई से अहमदाबाद के बीच तैयार हो रहा 508 किलोमीटर लंबा हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर न केवल यात्रा के समय को घटाएगा, बल्कि भारतीय रेल नेटवर्क को विश्वस्तरीय अत्याधुनिक तकनीक से भी लैस करेगा।

320 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ने के लिए डिजाइन की गई यह बुलेट ट्रेन महाराष्ट्र और गुजरात के बीच कुल 12 प्रमुख स्टेशनों को आपस में जोड़ेगी। इस पूरे रूट का सबसे आकर्षक और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण पहलू मुंबई के पास बनने वाला लगभग 21 किलोमीटर लंबा भूमिगत सेक्शन है, जिसमें ठाणे क्रीक के नीचे से गुजरने वाली भारत की पहली अंडरसी रेल टनल भी शामिल है।

सामान्य ट्रैक से अलग क्यों है हाई-स्पीड रूट?

आमतौर पर पारंपरिक रेल पटरियों पर जहां दो लाइनें आपस में मिलती हैं या एक-दूसरे को काटती हैं, वहां पहियों के मूवमेंट के लिए एक हल्का सा गैप या खाली जगह छोड़ी जाती है। सामान्य स्पीड में जब ट्रेन के पहिए इस हिस्से से निकलते हैं, तो यात्रियों को हल्का झटका, खट-खट की आवाज और कंपन महसूस होता है। हालांकि, जब कोई ट्रेन 320 किमी प्रति घंटे जैसी तूफानी रफ्तार से दौड़ रही हो, तो ट्रैक का यह मामूली सा गैप भी बहुत बड़ा खतरा और असुविधा पैदा कर सकता है। इसी तकनीकी चुनौती को पूरी तरह खत्म करने के लिए नेशनल हाई-स्पीड रेल कॉर्पोरेशन इस रूट पर 'मूवेबल क्रॉसिंग' और 'कैंटेड टर्नआउट' जैसी विश्वस्तरीय जापानी तकनीकों का इस्तेमाल कर रहा है, ताकि ट्रेन बिना किसी रुकावट के मक्खन जैसी चिकनी सतह पर आगे बढ़ती रहे।

स्विंग-नोज क्रॉसिंग से खत्म होगा ट्रैक का गैप

इस ट्रैक की सबसे बड़ी यूएसपी मूवेबल क्रॉसिंग है, जिसे रेलवे इंजीनियरिंग की भाषा में 'स्विंग-नोज क्रॉसिंग' भी कहा जाता है। आम पटरियों के विपरीत, इस हाई-स्पीड सिस्टम में रेल के आगे वाले हिस्से (नोज) को आधुनिक पॉइंट मशीनों के जरिए जरूरत के अनुसार सटीक पोजीशन में शिफ्ट कर दिया जाता है। इसका फायदा यह होता है कि ट्रैक पर कहीं भी खुला गैप नहीं बचता और पहियों को एक निरंतर, सपाट और बिना टूटी हुई रेल लाइन मिलती है। जब ट्रेन के पहिए किसी भी खाली जगह से नहीं टकराते, तो न केवल सफर के दौरान लगने वाला झटका और कंपन पूरी तरह खत्म हो जाता है, बल्कि भारी दबाव से पटरियों में होने वाली टूट-फूट का जोखिम भी न के बराबर रह जाता है।

कैंटेड टर्नआउट संभालेगा साइड का झटका

तेज रफ्तार में ट्रैक बदलते समय लगने वाले साइडवे झटके (लेटरल फोर्स) को काबू में करने के लिए 'कैंटेड टर्नआउट' सिस्टम तैयार किया गया है। टर्नआउट वह तकनीकी ढांचा होता है जो ट्रेन को एक लाइन से दूसरी लाइन पर डाइवर्ट करता है। कैंटेड डिजाइन में ट्रैक को एक खास वैज्ञानिक कोण पर झुकाया जाता है, जिसमें बाहरी पटरी को भीतरी पटरी के मुकाबले थोड़ा ऊंचा रखा जाता है। यह झुकाव सेंट्रीफ्यूगल फोर्स को संतुलित कर देता है, जिससे मोड़ या लेन बदलते समय यात्रियों को साइड की तरफ खिंचाव या तेज झटका महसूस नहीं होता और ट्रेन का संतुलन पूरी तरह स्थिर बना रहता है।