नाबालिग पत्नी से संबंध पर बुरे फंसे 'भाईजान', क्या बोला केरल हाईकोर्ट?

नाबालिग पत्नी से संबंध पर बुरे फंसे 'भाईजान', क्या बोला केरल हाईकोर्ट?

कोच्चि। देश में बाल विवाह और बच्चों के संरक्षण को लेकर अदालतों का रुख बेहद सख्त होता जा रहा है। हाल ही में केरल हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम और कड़े फैसले में स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत कम उम्र में शादी होने के बावजूद, नाबालिग पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने पर पोक्सो (POCSO) एक्ट के तहत कानूनी कार्रवाई से छूट नहीं मिलेगी। अदालत की इस टिप्पणी के बाद कानूनी हलकों में हलचल तेज हो गई है। यह मामला एक बार फिर व्यक्तिगत कानूनों और देश के बाल संरक्षण कानूनों के बीच के संघर्ष को सामने ले आया है।

क्या है पूरा मामला और अदालत की टिप्पणी?

केरल हाईकोर्ट के समक्ष सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा कि क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध मानी जाने वाली शादी किसी आरोपी को बाल यौन अपराध संरक्षण यानी पोक्सो अधिनियम के शिकंजे से बचा सकती है। अदालत ने साफ शब्दों में खारिज करते हुए कहा कि बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा की रक्षा करने वाला पोक्सो एक्ट सर्वोपरि है। अदालत के इस रुख से यह संदेश गया है कि धर्म या पर्सनल लॉ की आड़ में नाबालिगों के अधिकारों के हनन को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कानून की नजर में नाबालिग की सुरक्षा सबसे ऊपर है और इससे जुड़े मामलों में नरमी की कोई गुंजाइश नहीं है।

पोक्सो एक्ट बनाम पर्सनल लॉ: कानूनी पेचीदगियां

भारत में लंबे समय से पर्सनल लॉ और आधुनिक आपराधिक कानूनों के बीच बहस चलती रही है। बाल विवाह निषेध अधिनियम और पोक्सो एक्ट जैसे कड़े कानून बच्चों की शारीरिक और मानसिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट के इस फैसले से निचली अदालतों को भी एक स्पष्ट दिशा-निर्देश मिल गया है। अब यह साफ हो गया है कि पोक्सो कानून के दायरे में आने वाले अपराधों में किसी भी धार्मिक या व्यक्तिगत कानून के आधार पर राहत की उम्मीद नहीं की जा सकती।

समाज पर असर और आगे की राह

केरल हाईकोर्ट का यह फैसला देश भर में बाल विवाह के खिलाफ चल रही मुहिम को और मजबूत करता है। समाज में अभी भी कई जगह परंपराओं के नाम पर कम उम्र में शादियां कर दी जाती हैं, लेकिन इस तरह के सख्त न्यायिक कदम यह सुनिश्चित करते हैं कि कानून का डर बना रहे। बाल अधिकारों के संरक्षकों ने अदालत के इस फैसले का स्वागत किया है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून की नजर में हर बच्चा समान रूप से सुरक्षित है और उसकी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।