ब्रिक्स ने पूरी तरह से पलटकर रख दी वैश्विक कूटनीति की बिसात? जिन देशों को ....

ब्रिक्स ने पूरी तरह से पलटकर रख दी वैश्विक कूटनीति की बिसात? जिन देशों को ....

वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र के पटल पर पिछले कुछ वर्षों के दौरान यदि किसी एक संगठन ने सबसे तेजी से और प्रभावशाली तरीके से अपनी धमक दर्ज कराई है, तो वह 'ब्रिक्स' (BRICS) का नाम है। पश्चिमी देशों और पुरानी महाशक्तियों के एकाधिकार वाले वैश्विक ढांचे को चुनौती देते हुए ब्रिक्स आज दुनिया के उन तमाम विकासशील और उभरते हुए राष्ट्रों के लिए एक बहुत बड़ा उम्मीद का केंद्र बन चुका है, जिन्हें पारंपरिक वैश्विक मंचों पर कभी अपनी बात रखने का उचित मौका या सम्मान नहीं मिला था। दुनिया की कुल आबादी का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा और वैश्विक जीडीपी (GDP) का करीब 45 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करने वाला यह ताकतवर संगठन अब केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है, बल्कि यह ग्लोबल साउथ (Global South) की महाशक्ति के रूप में दुनिया के नक्शे पर अपनी एक नई और मजबूत इबारत लिख रहा है। इस लेख में हम विस्तार से यह समझेंगे कि आखिर कैसे ब्रिक्स ने दुनिया की पुरानी कूटनीति को पूरी तरह से बदल डाला है और यह संगठन कैसे हाशिए पर खड़े देशों के लिए दुनिया की सबसे बड़ी आवाज बनकर उभरा है।

क्या है ब्रिक्स का इतिहास और कैसे तय किया गया इस संगठन का यह शानदार सफर?

शुरुआती दौर में जब ब्राजील, रूस, भारत और चीन (BRIC) के रूप में इस अवधारणा की नींव रखी गई थी, तब पश्चिमी दुनिया के कई वित्तीय विश्लेषकों और राजनेताओं ने इसे केवल एक कागजी संगठन या कूटनीतिक प्रयोग कहकर खारिज कर दिया था। उनका यह मानना था कि अलग-अलग संस्कृतियों, राजनीतिक प्रणालियों और आर्थिक हितों वाले ये देश कभी एक मंच पर लंबे समय तक टिक नहीं सकते, लेकिन समय ने इन सभी पश्चिमी अनुमानों को पूरी तरह से गलत साबित कर दिया। साल 2010 में दक्षिण अफ्रीका के इस समूह में आधिकारिक रूप से शामिल होने के बाद इसका नाम 'ब्रिक्स' (BRICS) हो गया, और इसके बाद से इसका दायरा लगातार बढ़ता चला गया। हाल के वर्षों में इसमें दुनिया के कई अन्य प्रभावशाली देशों के जुड़ने से इसकी ताकत में कई गुना इजाफा हुआ है, जिससे यह साबित हो गया है कि अब वैश्विक फैसले केवल वॉशिंगटन या लंदन में बैठकर तय नहीं किए जा सकते।

पश्चिमी देशों के एकाधिकार को खुली चुनौती: डॉलर के वर्चस्व और पुरानी संस्थाओं पर प्रहार

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही वैश्विक वित्तीय व्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक जैसी संस्थाओं पर पश्चिमी देशों और अमेरिकी डॉलर का एकछत्र राज चला आ रहा था। इन संस्थानों के जरिए विकासशील देशों पर ऐसी नीतियां थोपी जाती थीं जो अक्सर उनके अपने राष्ट्रीय हितों के खिलाफ होती थीं, और उन्हें वैश्विक फैसलों में पर्याप्त वोटिंग अधिकार या हिस्सेदारी नहीं मिलती थी। ब्रिक्स ने इस पुरानी और असमान व्यवस्था के खिलाफ मुखर होकर आवाज उठाई है। इस संगठन ने अपने सदस्य देशों के बीच आपसी व्यापार के लिए स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को बढ़ावा देने और न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) के माध्यम से बिना किसी कठोर और अपमानजनक शर्तों के विकासशील देशों को कर्ज मुहैया कराने की एक बेहतरीन वैकल्पिक व्यवस्था खड़ी कर दी है, जिससे पश्चिमी वित्तीय महाशक्तियों की दादागीरी को तगड़ा झटका लगा है।

ग्लोबल साउथ की नई ताकत: जिन्हें कभी नहीं मिला मौका, उन्हें ब्रिक्स ने दी बुलंद आवाज

ब्रिक्स की सबसे बड़ी सफलता और सार्थकता इस बात में निहित है कि इसने उन तमाम विकासशील, अफ्रीकी, एशियाई और लैटिन अमेरिकी देशों को एक ऐसा मंच प्रदान किया है जिनकी आवाज को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हमेशा दबा दिया जाता था। आज अफ्रीका के गरीब और संसाधन-संपन्न देश हों या एशिया के उभरते हुए आर्थिक राष्ट्र, सभी को ब्रिक्स के जरिए दुनिया के बड़े मंचों पर सम्मानजनक हिस्सेदारी और अपनी बात रखने का समान अवसर मिल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य वैश्विक नेताओं ने भी हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि ब्रिक्स किसी भी देश के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा निष्पक्ष मंच है जो दुनिया के बहुध्रुवीय (Multipolor) स्वरूप को मजबूत करने और शांति, विकास तथा समानता के सिद्धांतों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थन करता है।

भविष्य की वैश्विक कूटनीति और ब्रिक्स के सामने आने वाली चुनौतियां

भले ही ब्रिक्स ने दुनिया की आधी आबादी और 45 प्रतिशत जीडीपी की ताकत के साथ वैश्विक कूटनीति की दिशा बदलकर रख दी हो, लेकिन इस संगठन के सामने आने वाले दिनों में कई बड़ी आंतरिक और बाहरी चुनौतियां भी मौजूद हैं। समूह के भीतर ही भारत और चीन जैसे दो बड़े दिग्गजों के अपने भू-राजनीतिक और सीमाई मतभेद हैं, जिन्हें समय-समय पर प्रबंधित करना आवश्यक होता है। इसके अलावा, पश्चिमी देशों द्वारा इस संगठन को काउंटर करने के लिए बनाए जा रहे नए रणनीतिक गठबंधनों से भी ब्रिक्स को लगातार सतर्क रहना होगा। इसके बावजूद, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि 21वीं सदी की भू-राजनीति में ब्रिक्स अब एक ऐसा स्थायी और अजेय सत्य बन चुका है जिसे नजरअंदाज करके दुनिया का कोई भी देश अपने भविष्य का ताना-बाना नहीं बुन सकता।