विदेश में बैठे गैंगस्टर कैसे चुन लेते हैं भारत में एक्सटॉर्शन का टारगेट? सामने आया मामला
अपराध की दुनिया और अंडरवर्ल्ड के तौर-तरीके पिछले कुछ वर्षों के दौरान तकनीकी विकास और सोशल मीडिया के प्रसार के साथ पूरी तरह से बदल चुके हैं, जिससे देश की कानून-व्यवस्था के सामने एक नई और गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है। देश से कोसों दूर विदेश की सुरक्षित धरती पर बैठकर भारत के कारोबारियों, बिल्डरों और हाई-प्रोफाइल हस्तियों को निशाना बनाने वाले गैंगस्टर आखिर कैसे अपने एक्सटॉर्शन (Extortion) यानी रंगदारी के टारगेट का चुनाव करते हैं, इसका पर्दाफाश करने वाला एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। हाल ही में जांच एजेंसियों के हाथ लगे लगभग 200 करोड़ रुपये की भारी-भरकम रंगदारी और फिरौती से जुड़े इस बहुचर्चित केस ने इस बात की पोल खोल दी है कि कैसे देश के भीतर बैठे उनके गुर्गे और स्लीपर सेल विदेश में बैठे मास्टरमाइंड्स के लिए टारगेट की पूरी कुंडली तैयार करते हैं। इस हैरान कर देने वाले मामले के उजागर होने के बाद से सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है, क्योंकि यह सिर्फ एक व्यक्ति विशेष से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि यह देश भर के उद्योग जगत में फैलाए जा रहे एक सुनियोजित आतंक का काला चिट्ठा है।
विदेश से रिमोट कंट्रोल से चलने वाला अपराध का नेटवर्क और टारगेट चुनने का खौफनाक तरीका
सुरक्षा एजेंसियों और एटीएस की शुरुआती जांच में यह बात सामने आई है कि विदेश में बैठे ये कुख्यात गैंगस्टर किसी भी कारोबारी को यूं ही रैंडम तरीके से अपना शिकार नहीं बनाते हैं, बल्कि इसके पीछे एक बेहद शातिर और लंबा होमवर्क किया जाता है। टारगेट चुनने की इस प्रक्रिया में सबसे पहले देश के भीतर सक्रिय उनके स्थानीय फाइनेंसर, रेकी करने वाले बदमाश और प्रॉपर्टी डीलर्स शामिल होते हैं, जो यह पता लगाते हैं कि किस शख्स के पास अकूत संपत्ति है, कौन नया करोड़पति बना है या फिर किसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि कमजोर है। इसके बाद पीड़ित की हर एक गतिविधि, उसके परिवार के सदस्यों के दैनिक रूटीन और बच्चों के स्कूलों की पूरी जानकारी सोशल मीडिया या स्थानीय संपर्कों के जरिए जुटाई जाती है। जब पूरी रिपोर्ट विदेश में बैठे सरगना के पास पहुंच जाती है, तो वे इंटरनेट कॉलिंग और वर्चुअल नंबरों के जरिए टारगेट से संपर्क साधकर करोड़ों की रंगदारी मांगना शुरू करते हैं।
200 करोड़ की रंगदारी का यह बहुचर्चित केस: कैसे परत-दर-परत खुला अपराध का यह काला साम्राज्य?
हाल ही में सामने आए 200 करोड़ रुपये की रंगदारी के इस हाई-प्रोफाइल मामले ने देश के बड़े-बड़े कारोबारियों की नींद उड़ा दी है। पीड़ित व्यवसायी को जब पहली बार अंतरराष्ट्रीय नंबरों से धमकियां मिलनी शुरू हुईं और उसके बिजनेस को बम से उड़ाने या परिवार को खत्म करने की बात कही गई, तो उसने शुरुआत में डर की वजह से बात को दबाने की कोशिश की। लेकिन जब धमकियों का सिलसिला थमने के बजाय बढ़ता गया और बदमाशों ने एक के बाद एक कई ठिकानों पर फायरिंग करवाकर अपनी दहशत का खौफनाक इजहार किया, तब पीड़ित ने हिम्मत जुटाकर इसकी शिकायत पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से की। इसके बाद एंटी-एक्सटॉर्शन सेल और स्पेशल टास्क फोर्स ने जब इस मामले की तकनीकी जांच शुरू की, तो उनके हाथ जो सुराग लगे, उन्होंने अच्छे-अच्छों के होश उड़ा दिए। यह पूरा रैकेट हवाला के जरिए विदेशों में पैसे भेजने और देश के अलग-अलग राज्यों से जेल के अंदर और बाहर बैठे गुर्गों के जरिए संचालित किया जा रहा था।
हवाला नेटवर्क और सोशल मीडिया का खतरनाक मेल: कैसे बिना पकड़े पहुंचे जाते हैं रंगदारी के पैसे?
इस तरह के बड़े एक्सटॉर्शन मामलों में सबसे बड़ा पेच रंगदारी की रकम वसूलने का होता है, क्योंकि पुलिस और एजेंसियां बैंक खातों की ट्रैकिंग आसानी से कर लेती हैं। लेकिन इन शातिर गैंगस्टर्स ने इस से बचने के लिए हवाला चैनलों, क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrency) और फर्जी शेल कंपनियों का एक जटिल जाल बुन रखा है। भारत में डराए-धमकाए गए कारोबारियों से वसूली गई रकम को छोटे-छोटे टुकड़ों में नकद या हवाला के जरिए विदेश में बैठे आकाओं तक पहुंचाया जाता है, जहां से वे इस काले धन का इस्तेमाल अपने आपराधिक साम्राज्य को और अधिक मजबूत करने के लिए करते हैं। इसके अलावा, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे इंस्टाग्राम, टेलीग्राम और व्हाट्सएप का इस्तेमाल करके वे अपनी पहचान छिपाते हैं और एन्क्रिप्टेड चैट के जरिए अपने गुर्गों को निर्देश देते हैं, जिससे जांच एजेंसियों के लिए उन तक पहुंचना एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाता है।
देश की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती: इस नासूर से कैसे निपटेगा प्रशासन?
विदेश में बैठकर देश की अर्थव्यवस्था और कारोबारियों को निशाना बनाने वाले इन गैंगस्टर्स का यह बढ़ता नेटवर्क अब राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में आता जा रहा है। यदि समय रहते इस प्रकार के 200 करोड़ रुपये के सिंडिकेट्स पर पूरी तरह से नकेल नहीं कसी गई, तो यह देश के निवेश माहौल और व्यापारिक आत्मविश्वास को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। केंद्र और राज्य की सुरक्षा एजेंसियां अब इंटरपोल (Interpol) और विदेशी खुफिया तंत्र के साथ मिलकर इन बैठे हुए मास्टमाइंड्स के प्रत्य extradition (प्रत्यापन) और उनके स्थानीय नेटवर्क को नेस्तनाबूद करने के लिए एक साझा रणनीति पर काम कर रही हैं। यह वक्त की सबसे बड़ी मांग है कि तकनीक का दुरुपयोग कर रहे इन अपराधियों के हर एक लिंक को समय रहते तोड़ा जाए, ताकि देश का हर नागरिक और उद्यमी खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस कर सके।