कुत्तों पर जंग: डॉग लवर्स बनाम बाकी दुनिया, बापू किन कुत्तों के वध के थे पक्षधर?

कुत्तों पर जंग: डॉग लवर्स बनाम बाकी दुनिया, बापू किन कुत्तों के वध के थे पक्षधर?

देश भर के विभिन्न शहरों, सोसाइटियों और ग्रामीण इलाकों में आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों ने एक गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक संकट खड़ा कर दिया है। एक तरफ जहां कुत्ते के काटने से होने वाले रेबीज के मामले और बच्चों पर जानलेवा हमलों की खबरें आए दिन मीडिया की सुर्खियां बनती हैं, वहीं दूसरी तरफ पशु अधिकार कार्यकर्ता और 'डॉग लवर्स' इन बेजुबानों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए मजबूती से खड़े नजर आते हैं। यह मुद्दा अब केवल स्थानीय निकायों तक सीमित न रहकर अदालतों की चौखट और संसद की बहसों तक जा पहुंचा है। आम जनता अपनी और अपने बच्चों की सुरक्षा की मांग कर रही है, जबकि पशु प्रेमी पशु क्रूरता निवारण कानूनों का हवाला देकर सड़क पर रहने वाले कुत्तों के संरक्षण की बात करते हैं। सुरक्षा और मानवीय संवेदनाओं के बीच यह टकराव दिनों-दिन तीखा होता जा रहा है, जिससे कई आवासीय सोसाइटियों में आए दिन निवासियों और डॉग फीडर्स के बीच विवाद और मारपीट की नौबत आ जाती है।

डॉग लवर्स और आम नागरिकों के बीच क्यों बढ़ता जा रहा है तनाव और प्रशासनिक असफलताएं

शहरों में आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए स्थानीय निकायों द्वारा चलाए जाने वाले एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) कार्यक्रम यानी नसबंदी और टीकाकरण अभियान जमीनी स्तर पर पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो पा रहे हैं। कई जगह बजटीय कमी और लापरवाही के कारण आवारा कुत्तों की संख्या पर लगाम नहीं लग पा रही है। जब किसी इलाके में आवारा कुत्ते किसी बच्चे या बुजुर्ग पर हमला कर देते हैं, तो वहां आक्रोश फैलना स्वाभाविक हो जाता है। ऐसे माहौल में जब पशु प्रेमी उन्हीं कुत्तों को खाना खिलाने आते हैं, तो स्थानीय लोग इसका पुरजोर विरोध करते हैं। स्थानीय निवासियों का कहना होता है कि कुत्तों को खाना देने से वे उसी जगह जमावड़ा बना लेते हैं और राहगीरों के लिए खतरा पैदा करते हैं, जबकि डॉग लवर्स का तर्क है कि भूखे कुत्ते ज्यादा आक्रामक होते हैं और उन्हें भोजन देना कानूनन सही है। इस वैचारिक और व्यवहारिक खाई के कारण समाज में एक बड़ा विभाजन देखने को मिल रहा है।

क्या थे महात्मा गांधी के विचार: बापू किन परिस्थितियों में कुत्तों के वध के थे पक्षधर

इस बहस के बीच राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के उन विचारों की चर्चा भी अक्सर की जाती है जो उन्होंने 1926 में अपनी पत्रिका 'नवजीवन' और 'यंग इंडिया' में लिखे थे। अहिंसा के सबसे बड़े पुजारी माने जाने वाले बापू के सामने जब अहमदाबाद में आवारा और रेबीज पीड़ित कुत्तों से जुड़ा विवाद आया था, तब उन्होंने बेहद व्यावहारिक और कड़ा रुख अपनाया था। गांधी जी का स्पष्ट मानना था कि अत्यधिक पीड़ा झेल रहे, रेबीज से संक्रमित या समाज के लिए बेहद हिंसक और खतरनाक हो चुके आवारा कुत्तों को मारना भी अहिंसा और मानवता के दायरे में आता है। बापू ने तर्क दिया था कि यदि कोई कुत्ता असहाय अवस्था में तड़प रहा हो या इतना हिंसक हो गया हो कि इंसानी जीवन के लिए सीधा खतरा बन जाए, तो उसे तड़पाने या खुला छोड़ने के बजाय दयापूर्वक उसका अंत कर देना ही सच्चा धर्म है। उन्होंने इस बात पर बल दिया था कि इंसानी जान की सुरक्षा और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना सर्वोपरि है, और केवल अंधी दयाभाव के कारण समाज को खतरे में डालना अहिंसा नहीं बल्कि कायरता है।

संतुलन की तलाश: कानूनी प्रावधान, वैज्ञानिक समाधान और आगे का रास्ता

महात्मा गांधी के ऐतिहासिक दृष्टिकोण और आज के आधुनिक कानूनी ढांचे के बीच संतुलन बनाना समय की सबसे बड़ी मांग है। भारतीय संविधान जहां जीवों के प्रति दयाभाव रखने का निर्देश देता है, वहीं नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा करना भी राज्य का प्राथमिक कर्तव्य है। इस समस्या का स्थायी समाधान केवल विवाद करने या केवल कुत्तों को हटाने से संभव नहीं है। इसके लिए वैज्ञानिक तरीके से व्यापक नसबंदी, नियमित रेबीज टीकाकरण, शेल्टर होम्स का निर्माण और डॉग फीडिंग के लिए सोसाइटियों में अलग से निश्चित स्थान (Feeding Zones) तय करने की सख्त जरूरत है। इसके साथ ही पेट ओनर्स के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य करने और पालतू कुत्तों को सड़कों पर छोड़ने वाले लोगों पर भारी जुर्माना लगाने जैसे कदम भी आवश्यक हैं। जब तक प्रशासन, डॉग लवर्स और आम नागरिक मिलकर एक ठोस रणनीति नहीं बनाएंगे, तब तक सुरक्षा और जीव दया के बीच यह जंग खत्म होना मुश्किल है।