राजस्थान से कांग्रेस ने नीरज डांगी पर फिर खेला बड़ा दांव, जानें क्यों लगातार तीन हार के बाद भी खड़गे की पहली पसंद बने डांगी
राजस्थान की सियासत से इस वक्त की बड़ी खबर राज्यसभा चुनाव को लेकर आ रही है। कांग्रेस आलाकमान ने आगामी राज्यसभा चुनाव 2026 के लिए अपने पत्ते खोलते हुए मौजूदा सांसद नीरज डांगी पर एक बार फिर बड़ा भरोसा जताया है। पार्टी ने उन्हें लगातार दूसरी बार उच्च सदन (राज्यसभा) का टिकट देकर मैदान में उतारा है। राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस के मौजूदा संख्या बल को देखते हुए इस एक सीट पर पार्टी की जीत पूरी तरह तय मानी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीरज डांगी को दोबारा मौका देकर कांग्रेस नेतृत्व ने न सिर्फ राजस्थान में अपने परंपरागत दलित वोट बैंक को एक बेहद मजबूत संदेश दिया है, बल्कि पार्टी के अंदरूनी गुटीय और संगठनात्मक संतुलन को भी बहुत ही चतुराई से साधने की कोशिश की है।
18 जून को होगा मतदान, इन 3 दिग्गजों का कार्यकाल हो रहा समाप्त
राजस्थान से राज्यसभा की तीन सीटों के लिए आगामी 18 जून 2026 को सुबह से मतदान प्रक्रिया शुरू होगी और इसी दिन शाम को मतगणना के बाद परिणाम भी घोषित कर दिए जाएंगे। आपको बता दें कि केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू, भाजपा सांसद राजेंद्र गहलोत और कांग्रेस सांसद नीरज डांगी का छह साल का कार्यकाल आगामी 21 जून को समाप्त होने जा रहा है, जिसके चलते ये तीनों सीटें खाली हो रही हैं। इन खाली हो रही सीटों को भरने के लिए ही निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव कराए जा रहे हैं, जिसमें कांग्रेस ने बिना किसी बड़े उलटफेर के अपने पुराने चेहरे पर ही दांव आजमाना सही समझा।
अशोक गहलोत के करीबी से लेकर मल्लिकार्जुन खड़गे की पहली पसंद बनने तक का सफर
राजनीतिक गलियारों और सूत्रों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, नीरज डांगी को दोबारा राज्यसभा का टिकट मिलने के पीछे कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व का बेहद मजबूत समर्थन रहा है। डांगी को राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का बेहद खास और भरोसेमंद सिपहसालार माना जाता है। पिछले छह वर्षों के दौरान राज्यसभा के भीतर विभिन्न मुद्दों पर कांग्रेस की तरफ से सक्रिय भूमिका निभाने के कारण उनकी कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से भी नजदीकियां काफी बढ़ गईं। बताया जा रहा है कि खड़गे ने खुद उनके नाम की पुरजोर पैरवी की, जिसके बाद आलाकमान ने उनके नाम पर मुहर लगा दी। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि डांगी ने संसद में हर मोर्चे पर कांग्रेस की आवाज को बेहद प्रभावी ढंग से बुलंद किया है और संगठन के प्रति उनकी निष्ठा बेदाग रही है।
तीन विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद आलाकमान का रहा अटूट भरोसा
नीरज डांगी का राजनीतिक करियर काफी उतार-चढ़ाव और संघर्षों से भरा रहा है। उन्होंने राजस्थान की रेवदर विधानसभा सीट से साल 2003, 2008 और फिर 2018 में कांग्रेस के सिंबल पर भाग्य आजमाया था, लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें तीनों ही बार शिकस्त झेलनी पड़ी थी। लगातार तीन बार चुनाव हारने के बावजूद पार्टी ने उनकी संगठनात्मक क्षमता और गांधी परिवार के प्रति अटूट वफादारी को देखते हुए साल 2020 में पहली बार उन्हें राज्यसभा भेजकर सबको चौंका दिया था। यूथ कांग्रेस से अपनी राजनीति का ककहरा सीखने वाले डांगी संगठन में कई अहम पदों पर रहे हैं। वे एक मजबूत राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं; उनके पिता दिनेशराय डांगी भी कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में शुमार थे और प्रदेश सरकार में मंत्री व विधायक रह चुके हैं।
राजस्थान में निर्विरोध चुनाव होने की स्थिति, जानिए विधानसभा का गणित
ताजा राजनीतिक हालातों को देखते हुए राजस्थान की इन तीनों राज्यसभा सीटों पर चुनाव निर्विरोध संपन्न होने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं। सूबे के मौजूदा संख्या बल के हिसाब से भारतीय जनता पार्टी दो और कांग्रेस केवल एक उम्मीदवार ही मैदान में उतार रही है। अगर भाजपा अपना तीसरा या कांग्रेस अपना दूसरा डमी उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारती है, तो आगामी 11 जून को नाम वापसी की आखिरी तारीख बीतते ही तीनों उम्मीदवारों की निर्विरोध जीत का आधिकारिक एलान कर दिया जाएगा।
संख्या बल की बात करें तो राज्यसभा की एक सीट को जीतने के लिए प्रथम वरीयता के न्यूनतम 51 विधायकों के वोटों की जरूरत होती है। राजस्थान विधानसभा में भाजपा के पास अपने दम पर दो सीटें आसानी से जीतने लायक बहुमत है, लेकिन तीसरी सीट के लिए उसे अतिरिक्त 35 विधायकों के समर्थन की दरकार होगी, जो मौजूदा परिस्थितियों में नामुमकिन जैसा है। यही वजह है कि दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दल किसी भी तरह की क्रॉस वोटिंग या जोखिम से बचते हुए अपने तय संख्या बल के अनुसार ही कदम आगे बढ़ा रहे हैं।