मछली ही नहीं, बंगाल में महाअष्टमी पर मां दुर्गा को लगते हैं ये सारे भोग; खिचड़ी से लुची-पायेश तक लंबी है लिस्ट

मछली ही नहीं, बंगाल में महाअष्टमी पर मां दुर्गा को लगते हैं ये सारे भोग; खिचड़ी से लुची-पायेश तक लंबी है लिस्ट

सनातन संस्कृति और देश के सबसे बड़े और भव्य त्योहारों में शुमार दुर्गा पूजा (Durga Puja) का नाम आते ही मन में बंगाल की संस्कृति, ढाक की थाप, धुनुची नृत्य और ढेरों स्वादिष्ट व्यंजनों की खुशबू तैरने लगती है। देश और दुनिया में भले ही दुर्गा पूजा को मां दुर्गा की आराधना का महापर्व माना जाता है, लेकिन पश्चिम बंगाल में यह उत्सव एक सांस्कृतिक महाकुंभ का रूप ले लेता है, जहां आस्था और खानपान का एक बेहद अद्भुत और अनूठा संगम देखने को मिलता है। आम तौर पर लोगों के मन में यह धारणा होती है कि मां दुर्गा को केवल फलाहार या मिठाई का भोग लगाया जाता है, लेकिन बंगाल की समृद्ध परंपरा में महाअष्टमी के पावन अवसर पर मां को जो महाभोग अर्पित किया जाता है, उसकी भव्यता देखकर किसी के भी मुंह में पानी आ जाए। महाअष्टमी के दिन बंगाल के पारंपरिक पूजा पंडालों और घरों में मां दुर्गा को केवल शाकाहारी ही नहीं, बल्कि कई प्रकार के विशिष्ट मांसाहारी और पारंपरिक व्यंजनों का भोग लगाने की प्राचीन परंपरा चली आ रही है। इस विशेष रिपोर्ट में हम आपको बंगाल की उसी भव्य महाअष्टमी के भोग और खानपान के उस शानदार सफर पर ले चल रहे हैं जो इस पर्व को दुनिया भर में सबसे अलग और खास बनाता है।

महाअष्टमी के दिन बंगाल में मां दुर्गा को लगाए जाने वाले भोग का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा का हर एक दिन अपने आप में बहुत खास होता है, लेकिन महाअष्टमी की तिथि को इस पूरे उत्सव का सबसे केंद्रीय और सबसे पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन माता दुर्गा के महागौरी स्वरूप की पूजा की जाती है और उन्हें प्रसन्न करने के लिए विशेष प्रकार के भोग तैयार किए जाते हैं। बंगाली संस्कृति में भोजन को केवल पेट भरने का जरिया नहीं बल्कि प्रेम, आतिथ्य और भगवान के प्रति समर्पण का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता है। महाअष्टमी के अवसर पर पूजा पंडालों में सुबह से ही एक अलग ही चहल-पहल शुरू हो जाती है जहां पुरोहितों और भक्तों के सहयोग से मां को अर्पित किए जाने वाले महाभोग की तैयारियां युद्धस्तर पर की जाती हैं। यह महाभोग न केवल देवी को तृप्त करता है, बल्कि पूजा संपन्न होने के बाद 'भोग वितरण' के जरिए हजारों श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद के रूप में बांटा जाता है, जिसे पाने के लिए लोग घंटों लंबी कतारों में खड़े रहते हैं।

पारंपरिक भोग की शुरुआत: महाभोग में बनने वाली विशेष भोग खिचड़ी और लबड़ा

जब बात बंगाल की महाअष्टमी के भोग की होती है, तो सबसे पहला नाम 'भोगेर खिचड़ी' (Bhoger Khichuri) और 'लाबड़ा' (Labra) का आता है। यह कोई साधारण खिचड़ी नहीं होती, बल्कि इसे गोविंदभोग चावल, मूंग की दाल, शुद्ध घी और तमाम प्रकार की ताजी हरी सब्जियों जैसे कद्दू, बैंगन, परवल और मूली को मिलाकर बड़े ही विधि-विधान से पकाया जाता है। इस खिचड़ी की खास बात यह होती है कि इसमें प्याज और लहसुन का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं किया जाता है, फिर भी इसका स्वाद इतना लाजवाब होता है कि खाने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता है। इसके साथ बनने वाली 'लाबड़ा' सब्जी विभिन्न प्रकार की मौसमी सब्जियों का एक ऐसा अनोखा मिश्रण होती है जिसे पारंपरिक मसालों और मसालों के मेल से तैयार किया जाता है। मां दुर्गा को इस गरम-गरम भोग खिचड़ी और लाबड़ा का सबसे पहला भोग लगाया जाता है, जिसके बाद इसे महाप्रसाद के रूप में भक्तों में वितरित किया जाता है।

बंगाली महाअष्टमी की थाली में लुची, छोलार दाल और पारंपरिक मिठाइयों की रौनक

खिचड़ी के अलावा महाअष्टमी के दिन बंगाल के घरों और पंडालों में मैदे से बनी फुली हुई खस्ता 'लुची' (Luchi) और उसके साथ खाने के लिए गाढ़ी 'छोलार दाल' (Cholar Dal) का विशेष प्रबंध किया जाता है। छोलार दाल को चने की दाल, नारियल के टुकड़ों, किशमिश और खड़े मसालों के साथ एक खास बंगाली अंदाज में पकाया जाता है, जिसका मीठा और नमकीन स्वाद हर किसी को पसंद आता है। इसके साथ ही भोग की थाली में सूजी का हलवा जिसे बंगाली में 'नोनेर सूजी' या 'पापड़' कहा जाता है, उसकी मौजूदगी इस थाली को पूरी तरह से पूर्ण बनाती है। मिष्ठान के बिना बंगाल का कोई भी उत्सव पूरा नहीं हो सकता, इसलिए महाअष्टमी के इस पावन भोग में रसगुल्ला, संदेश, मिष्टी दही और गर्म-गरम चावल की 'पायेश' (Payesh) की लंबी फेहरिस्त शामिल होती है, जो मां को अतिप्रिय है।

मां को मछली का भोग: बंगाल की प्राचीन और अनोखी लोक परंपरा

इस पूरी भोग सूची में सबसे हैरान करने वाली और सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बनने वाली बात यह है कि बंगाल के कई पारंपरिक परिवारों और विशेष रूप से कुछ चुनिंदा ऐतिहासिक पूजा पंडालों और शक्तिपीठों में महाअष्टमी या महानवमी के अवसर पर मां दुर्गा को मछली का भोग भी अर्पित किया जाता है। बंगाली संस्कृति में मछली को शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, और चूंकि बंगाल की भौगोलिक स्थिति और संस्कृति जल और नदियों से गहराई से जुड़ी है, इसलिए मां को अपनी पुत्री मानकर उन्हें उनकी पसंद का हर वो भोजन कराया जाता है जो बंगाल के घरों में बनता है। 'इlish माचेर झाल' (Hilsa Curry) या रोहू मछली के पारंपरिक व्यंजनों को बहुत ही पवित्रता के साथ तैयार करके मां को समर्पित किया जाता है, जो इस बात का प्रमाण है कि बंगाल की संस्कृति कितनी विविधतापूर्ण और अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है।

महाअष्टमी की शाम को होने वाली महासंधि पूजा और भोग का समापन

दिनभर चलने वाले इन भव्य भोग और अनुष्ठानों के बाद महाअष्टमी की शाम को 'संधि पूजा' (Sandhi Puja) का वह जादुई पल आता है जो दुर्गा पूजा का सबसे बड़ा और आध्यात्मिक रूप से सबसे शक्तिशाली क्षण माना जाता है। अष्टमी और नवमी तिथि के संधि काल में मां दुर्गा की चामुंडा रूप में पूजा की जाती है, और इस दौरान 108 कमल के फूल और 108 दीये जलाए जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान माहौल पूरी तरह भक्तिमय और गूंजते हुए मंत्रोच्चार से भर जाता है। संधि पूजा संपन्न होने के बाद एक बार फिर से मां को विभिन्न प्रकार के मिष्ठान और फलों का भोग लगाया जाता है और सुहागिन महिलाएं सिंदूर खेला की तैयारी में जुट जाती हैं। महाअष्टमी का यह पूरा दिन बंगाल की आत्मा, उसकी कला, उसके खानपान और उसकी अटूट आस्था का सबसे जीवंत दस्तावेज पेश करता है।

निष्कर्ष: बंगाल की दुर्गा पूजा और भोग की यह मिठास जीवन भर रहती है याद

अंततः, बंगाल में महाअष्टमी पर मां दुर्गा को लगाए जाने वाले इन तमाम महाभोगों की यह लंबी लिस्ट इस बात को साबित करती है कि यह पर्व केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह उत्सव, उल्लास, प्रेम और सामूहिक भोज का एक ऐसा महाउत्सव है जो इंसानों को आपस में जोड़ता है। खिचड़ी से लेकर लुची-पायेश और मछली तक के इन व्यंजनों की खुशबू पूरे बंगाल के आसमान में इस तरह घुल जाती है कि हर कोई इस भक्ति के रंग में रंग जाता है। यदि आपने कभी बंगाल की महाअष्टमी का यह अलौकिक नजारा और वहां का महाभोग नहीं देखा या चखा है, तो यकीन मानिए आपने भारतीय संस्कृति के सबसे सुंदर रूप का एक बड़ा हिस्सा मिस कर दिया है। मां दुर्गा की कृपा और इन स्वादिष्ट भोगों की मिठास आपके जीवन में हमेशा बनी रहे, इसी कामना के साथ दुर्गा पूजा का यह महापर्व हर साल हमारे जीवन में नई ऊर्जा भर जाता है।