एक ही रात में 5 भव्य मंदिरों का निर्माण, आखिर क्यों भगवान विष्णु को बनना पड़ा था मुर्गा

एक ही रात में 5 भव्य मंदिरों का निर्माण, आखिर क्यों भगवान विष्णु को बनना पड़ा था मुर्गा

सनातन संस्कृति और शिल्प कला के महान देवता भगवान विश्वकर्मा की जयंती (Vishwakarma Jayanti 2026) के पावन अवसर पर देश भर में उद्योगों, फैक्टरियों, कार्यशालाओं और शिल्पकारों के घरों में विशेष पूजा-अर्चना का दौर शुरू हो चुका है। ब्रह्मांड के पहले वास्तुकार और सृजन के देवता के रूप में पूजे जाने वाले भगवान विश्वकर्मा के चमत्कारों और उनकी अद्भुत वास्तुकला से जुड़े कई ऐसे रहस्य पुराणों में दर्ज हैं जो आज भी लोगों को हैरान कर देते हैं। उनकी अद्वितीय कारीगरी से जुड़ी एक बेहद प्रसिद्ध और दिलचस्प पौराणिक कथा झारखंड के एक खास इलाके से जुड़ी हुई है, जिसमें यह वर्णन मिलता है कि कैसे उन्होंने अपनी अद्भुत शक्ति से एक ही रात में पांच विशाल मंदिरों का निर्माण कार्य शुरू कर दिया था। लेकिन उनके इस महाअभियान को बीच में ही रोकने के लिए स्वयं सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु को एक मुर्गे का रूप धारण करना पड़ा था, जिसके पीछे एक बहुत ही गहरा और रहस्यमयी कारण छिपा हुआ था।

देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा और उनकी अलौकिक वास्तुकला का रहस्य

हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा वह महान देवशिल्पी हैं जिन्होंने सतयुग में स्वर्ग लोक, त्रेता युग में सोने की लंका, द्वापर युग में भगवान कृष्ण की द्वारका नगरी और कलयुग के आरंभ से पहले कई दिव्य महलों और शस्त्रों का निर्माण किया था। उनकी वास्तुकला और शिल्प कौशल के सामने दुनिया का बड़े से बड़ा इंजीनियर भी नतमस्तक हो जाता है। विश्वकर्मा जयंती के दिन केवल औजारों और मशीनों की ही पूजा नहीं की जाती, बल्कि उस सृजनात्मक ऊर्जा का सम्मान किया जाता है जो इस पूरी दुनिया को आकार देती है। जब भी वास्तुकला के इतिहास का जिक्र होता है, भगवान विश्वकर्मा का नाम सबसे पहले आता है, क्योंकि उनकी बनाई गई रचनाएं आज भी मानव सभ्यता के लिए एक अजूबा बनी हुई हैं। उनकी रचनात्मकता सिर्फ पत्थरों को जोड़ने तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे ब्रह्मांड के हर उस तत्व के रचयिता माने जाते हैं जो भौतिक रूप में हमारे आसपास दिखाई देता है।

एक ही रात में 5 मंदिरों का निर्माण और वह रहस्यमयी शर्त

झारखंड के देवघर जिले के आसपास और उससे जुड़ी पौराणिक कथाओं में यह उल्लेख मिलता है कि भगवान विश्वकर्मा ने एक बार अपनी अद्भुत शक्तियों का परिचय देते हुए एक ही रात में पांच भव्य मंदिरों के निर्माण का संकल्प लिया था। इस निर्माण कार्य के पीछे एक कड़ा नियम यह था कि यह सारा काम सूर्योदय होने से पहले यानी पूरी रात के अंधेरे में ही बिना किसी रुकावट के पूरा होना था। देवशिल्पी ने अपनी दैवीय शक्ति और रफ्तार का इस्तेमाल करते हुए पत्थरों को तराशना शुरू किया और देखते ही देखते वे पांचों मंदिर अपने अंतिम चरण में पहुंचने लगे। उस समय आसमान के नीचे हो रहे इस विशाल निर्माण की गूंज और पत्थरों के टकराने की आवाज से पूरी सृष्टि में खलबली मच गई थी, क्योंकि यदि वे मंदिर एक रात में बनकर तैयार हो जाते, तो धरती पर एक नया और अलोकिक धार्मिक केंद्र स्थापित हो जाता।

भगवान विष्णु को क्यों बनना पड़ा मुर्गा और कैसे टूटी वह शर्त?

जब देवताओं ने देखा कि भगवान विश्वकर्मा अपनी धुन में एक ही रात में पांचों मंदिरों को खड़ा कर रहे हैं, तो सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने के लिए इसमें हस्तक्षेप करना जरूरी हो गया। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु ने यह ठान लिया था कि इस निर्माण को सूर्योदय से पहले रोकना होगा, क्योंकि तय नियम के अनुसार यदि रात में ही कार्य पूरा हो जाता तो उसका अलग प्रभाव होता। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए भगवान विष्णु ने एक अद्भुत लीला रची और वे खुद एक मुर्गे का रूप धारण करके उचित समय से पहले ही जोर-जोर से बांग देने लगे। उस मुर्गे की आवाज सुनते ही भगवान विश्वकर्मा को यह भ्रम हो गया कि रात बीत चुकी है और सुबह का सूरज निकलने वाला है। अपनी शर्त और नियम के पक्के होने के कारण विश्वकर्मा जी ने यह मान लिया कि उनका समय समाप्त हो गया है, और वे उसी अधूरी अवस्था में उन पांचों मंदिरों को छोड़कर वहां से अंतर्ध्यान हो गए, जिसके बाद वे मंदिर आज भी उसी रूप में देखे जाते हैं।