Up kiran,Digital Desk : सोचिए, आप सुपरमार्केट जाते हैं, चमकती पैकेजिंग में रखे 'प्रीमियम', 'एंटीबायोटिक-फ्री' और 'हर्बल' अंडे उठाते हैं। आप दोगुनी कीमत देते हैं, इस भरोसे के साथ कि आप अपने परिवार को सबसे सेहतमंद चीज़ खिला रहे हैं। लेकिन क्या हो, अगर यही भरोसा एक झटके में टूट जाए?
पिछले कुछ दिनों से एक वायरल वीडियो और लैब रिपोर्ट ने हज़ारों लोगों की नींद उड़ा दी है। आरोप लगे हैं भारत के एक बहुत बड़े और भरोसेमंद एग ब्रांड 'एगोज' (Eggoz) पर। दावा है कि इनके अंडों में एक ऐसा खतरनाक और प्रतिबंधित केमिकल मिला है, जो कैंसर का कारण बन सकता है।
तो क्या वाकई 'हेल्दी' अंडे के नाम पर हमें ज़हर बेचा जा रहा है? क्या इससे हमारा डीएनए तक बदल सकता है? चलिए, इस पूरे मामले की तह तक चलते हैं, बिल्कुल आसान भाषा में।
कौन है Eggoz? रातों-रात हीरो से विलेन?
यह कोई छोटी-मोटी दुकान नहीं है। Eggoz एक चमकता हुआ स्टार्टअप है, जिसे IIT खड़गपुर के तीन दोस्तों ने 2017 में शुरू किया था। उन्होंने देखा कि भारत में 95% अंडों का कारोबार बिना किसी क्वालिटी कंट्रोल के चल रहा है। उन्होंने इसी कमी को पूरा करने का वादा किया - साफ, ताज़े, और सुरक्षित अंडे, सीधे फार्म से आपके घर तक।
उनका आइडिया इतना दमदार था कि निवेशकों ने उन पर करोड़ों रुपये लगा दिए। देखते ही देखते Eggoz दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे 11 बड़े शहरों का सबसे पसंदीदा अंडा ब्रांड बन गया।
कहानी में भूचाल: एक यूट्यूबर और एक लैब टेस्ट
सारा विवाद एक यूट्यूबर के वीडियो से शुरू हुआ, जो अपने चैनल पर फूड प्रोडक्ट्स की स्वतंत्र जांच करवाता है। उसने बाज़ार से Eggoz के अंडे खरीदे और उन्हें एक सरकारी मान्यता प्राप्त लैब में जांच के लिए भेज दिया।
जो रिपोर्ट आई, उसने सबके होश उड़ा दिए। रिपोर्ट में दावा किया गया कि अंडों में नाइट्रोफ्यूरान और AOZ नाम का केमिकल पाया गया। यह एक ऐसा एंटीबायोटिक है जिसे दुनिया के ज़्यादातर देशों में बैन किया जा चुका है क्योंकि इसे कैंसर पैदा करने वाला माना जाता है।
यह खबर आग की तरह फैली और सवाल उठने लगे कि Eggoz जो 'केमिकल-फ्री' होने का दावा करता है, वो झूठ बोल रहा था?
सबसे बड़ा डर: क्या ये अंडा आपका DNA बदल देगा?
कई वायरल वीडियो में दावा किया गया कि यह केमिकल हमारे शरीर का डीएनए बदल सकता है। यह सुनकर डरना स्वाभाविक है, लेकिन विज्ञान ऐसा नहीं मानता।
इसे सरल भाषा में समझिए: आपका पेट किसी सुपरहीरो की तरह है। जब आप कुछ भी खाते हैं, तो पेट के एसिड और एंजाइम उसमें मौजूद हर चीज़ को, चाहे वो डीएनए ही क्यों न हो, उसके सबसे छोटे टुकड़ों में तोड़ देते हैं। हमारा शरीर फिर उन टुकड़ों का इस्तेमाल अपना खुद का डीएनए बनाने के लिए करता है। मुर्गी का डीएनए सीधे आपके शरीर में घुसकर आपको नहीं बदल सकता। तो राहत की सांस लीजिए, आप इन अंडों को खाकर 'म्यूटेंट' नहीं बनेंगे।
तो फिर असली खतरा क्या है?
'डीएनए बदलने' का खतरा भले ही न हो, लेकिन खतरा टला नहीं है। असली खतरा है 'जीनोटॉक्सिसिटी' (Genotoxicity)।
इसका सीधा मतलब है कि यह केमिकल आपके डीएनए को तोड़-मरोड़ या डैमेज कर सकता है। जब डीएनए डैमेज होता है, तो हमारा शरीर उसे ठीक करने की कोशिश करता है। अगर यह मरम्मत ठीक से नहीं हो पाती, तो कोशिकाएं (cells) बिना कंट्रोल के बढ़ने लगती हैं, और इसी को कैंसर कहते हैं।
एक और बड़ा खतरा: 'सुपरबग्स'
कैंसर का खतरा तो लंबे समय में होता है, लेकिन एक खतरा और भी है - एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (AMR)। जब मुर्गियों को बार-बार यह प्रतिबंधित एंटीबायोटिक दिया जाता है, तो उनके शरीर में मौजूद बैक्टीरिया इस दवा से लड़ना सीख जाते हैं और 'सुपरबग' बन जाते हैं।
ये सुपरबग अंडों के जरिए इंसानों तक पहुँच सकते हैं। अब सोचिए, आपको मामूली सा फूड पॉइजनिंग हुआ और डॉक्टर की दी हुई कोई भी आम एंटीबायोटिक आप पर असर नहीं कर रही, क्योंकि आपके शरीर में मौजूद बैक्टीरिया पहले से ही 'सुपरबग' बन चुके हैं। यह एक बहुत बड़ा और अनदेखा खतरा है।
कहानी में असली ट्विस्ट: भारत का कानून क्या कहता है?
अमेरिका और यूरोप में इस केमिकल को लेकर 'ज़ीरो टॉलरेंस' नीति है। मतलब अगर लैब में इसकी ज़रा सी भी मात्रा मिल जाए, तो प्रोडक्ट बैन कर दिया जाता है।
लेकिन भारत में नियम थोड़े अजीब हैं। यहाँ भी यह केमिकल बैन है, लेकिन FSSAI (फ़ूड सेफ्टी अथॉरिटी) ने जांच के लिए इसकी एक ऊपरी सीमा (Tolerance Limit) तय की हुई है, जो 1.0 µg/kg है। एगोज के अंडों में मिली मात्रा (0.74 µg/kg) इस भारतीय सीमा के अंदर है।
यहीं पर Eggoz तकनीकी रूप से खुद को सही साबित कर सकता है, भले ही उनके अंडे यूरोप और अमेरिका के मानकों पर पूरी तरह फेल हों।
इस पर Eggoz ने क्या कहा?
कंपनी के फाउंडर अभिषेक नेगी ने सभी आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि उनके फार्म पर किसी भी तरह का प्रतिबंधित एंटीबायोटिक इस्तेमाल नहीं होता। उन्होंने अपने ग्राहकों को भरोसा दिलाया है कि वे क्वालिटी से कोई समझौता नहीं करेंगे और उन्होंने अपनी तरफ से कराई गई लैब रिपोर्ट्स भी साझा की हैं।
तो अब सवाल यह है कि एक उपभोक्ता के तौर पर हमें किस पर यकीन करना चाहिए? यह मामला सिर्फ एक ब्रांड का नहीं, बल्कि हमारे भरोसे, स्वास्थ्य और देश के फ़ूड सेफ्टी नियमों से जुड़ा है


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