मुख्यमंत्री कार्यालय को नियम-विरुद्ध प्रस्ताव भेजकर ओएसडी पद पर की गयी अवैध नियुक्ति पर मंत्री मौन !
वन निगम में फैला भ्रष्टाचार का साम्राज्य कैसे अपनी जड़ें निगम में जमा चुका है इसकी खबरें अक्सर मीडिया में सुर्खियां बटोरती रहती है। भ्रष्टाचार के नशे में चूर निगम के अफसरों पर शासन सत्ता भी कहीं न कहीं मेहरबान है। वन एवं पर्र्यावरण मंत्री डॉ अरुण कुमार सक्सेना यूँ तो वन निगम के अध्यक्ष भी हैं बावजूद इसके निगम भ्रष्टाचार के दलदल में इस कदर फंस चुका है कि उसे निकलना संभव नहीं हो पा रहा। विभागीय मंत्री भ्रस्टाचार से संबंधित सवालों या शिकायतों पर जाँच और कड़ी कार्रवाई की बातें तो करते हैं लेकिन मंत्री के दावे फाइलों में दबकर दम तोड़ते नजर आते हैं। वन निगम से संबंधित एक और मामला सामने आने के बाद विभागीय मंत्री और वन निगम अध्यक्ष डॉ अरुण कुमार सक्सेना मौन साधे हुए हैं। मामला है वन निगम में ओएसडी के पद पर नियुक्ति का। आपको बता दें कि बीते वर्षों में वन निगम में भारतीय वन सेवा के दो अफसरों के मृतक आश्रित के पद पर बतौर ओएसडी के पदों पर विनीता त्रिपाठी और गंगोत्री दुबे की नियुक्ति हुई। विनीता त्रिपाठी की नियुक्ति स्वर्गीय पीएन त्रिपाठी आईएफएस के मृतक आश्रित के रूप में और गंगोत्री दुबे की नियुक्ति स्वर्गीय प्रभाकर दुबे आईएफएस के मृतक आश्रित के रूप में हुई।
विनीता त्रिपाठी की ओएसडी के पद पर नियुक्ति पर सवाल उठे तो निगम प्रबंधन से लेकर शासन तक में सवाल उठे नतीजा ये हुआ कि विनीता त्रिपाठी को ओएसडी पद से ग्रेड 3 के बाबू पर प्रत्यावर्तित करते हुए आदेश जारी हुए। विनीता त्रिपाठी के मामले को बोर्ड बैठक में ले जाकर कार्रवाई को अंजाम दिया गया। यहाँ तक कि वेतन के रूप में ली गयी अतिरिक्त धनराशि की वसूली के आदेश जारी हुए। वहीँ दूसरे ओर गंगोत्री दुबे पर विभाग का नजरिया दूसरा था। गंगोत्री दुबे को ओएसडी के पद पर नियुक्ति का अनुमोदन के लिए शासन स्तर पर बड़ा खेल खेला गया। गंगोत्री दुबे की ओएसडी पद पर नियुक्ति के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजी जाने वाली फाइल में प्रशासकीय विभाग ने बड़ा खेल करते हुए मुख्यमंत्री कार्यालय को गुमराह करते हुए ओएसडी के पद पर नियुक्ति हेतु अनुमोदन प्राप्त कर लिया गया। चूँकि गंगोत्री दुबे की ओएसडी पर नियक्ति का अनुमोदन मुख्यमंत्री द्वारा ले लिया गया था इसलिए नियम विरुद्ध हुई इस नियक्ति की चर्चाओं पर विराम लग गया।
हाल ही के महीनों में ऑडिट की आपत्ति के बाद गंगोत्री दुबे की ओएसडी के पद हुई अवैध नियुक्ति का मामला एक बार फिर से चर्चा में आ गया। आपको ये भी बता दें कि वन निगम में मृतक आश्रित पद पर ओएसडी के पद नियुक्ति का कोई प्राविधान ही नहीं है और न ही वन निगम में ओएसडी का कोई पद ही सृजित है। ऐसे में ऑडिट आपत्ति के बाद प्रशासकीय विभाग पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इस संबंध में वन विभाग के जानकारों का कहना है कि मुख्यमंत्री जी को गलत या नियमविरुद्ध प्रस्ताव भेजने के लिए प्रशासकीय विभाग को ही दोषी माना जायेगा। इस मामले एक चौंकाने वाली बात ये भी है कि तत्कालीन प्रमुख सचिव के विरोध के बावजूद यहाँ तक कि ओएसडी के पद पर नियुक्ति पर प्रस्ताव ख़ारिज होने के बाद भी फाइल मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजकर और व्यक्तिगत पैरवी के बाद अनुमोदन लिया गया। इस मामले में शासन में विशेष सचिव वन के पद पर तैनात एक आईएफएस कैडर के अफसर की रही। इस संबंध में हमने विभाग में प्रमुख सचिव के पद कार्यरत रहे एक सेवानिवृत अधिकारी से जानकारी करनी चाही तो उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रकरण में प्रशासकीय विभाग और तत्कालीन अधिकारी पूरी तरह से जिम्मेदार हैं क्योंकि मुख्यमंत्री कार्यालय को गुमराह करते हुए गलत प्रस्ताव भेजकर अनुमोदन लिया गया जोकि विवेचना का विषय है।
इस मामले की पूरी जानकारी विभागीय मंत्री डॉ अरुण सक्सेना को है बावजूद इसके कार्रवाई के बजाय गंगोत्री दुबे निगम की आँखों का तारा बना हुआ है । कार्रवाई तो छोड़िये ओएसडी गंगोत्री दुबे को फील्ड का वाकायदा चार्ज मिला हुआ है जोकि नीति विरुद्ध है। भ्रष्टाचार के अन्य मामलों की तरह विभागीय मंत्री डॉ अरुण कुमार सक्सेना का रवैया वर्तमान है जो उनकी भ्रष्टाचार के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस की मुख्यमंत्री की मंशा पर सवाल उठाता है। जानकारी होने के बाद भी विभागीय मंत्री डॉ अरुण कुमार सक्सेना इस मामले मौन साधे हुए हैं।