36 साल की उम्र में बन गई 69 की ‘बुजुर्ग’, सालों तक उठाती रही सरकारी पेंशन का फायदा
कमजोर और बुजुर्ग नागरिकों को आर्थिक सहारा देने के उद्देश्य से बनाई गई सरकारी योजनाएं किस तरह प्रशासनिक ढिलाई के चलते अपात्रों के हाथ में चली जाती हैं इसका उदाहरण उत्तर प्रदेश के इटावा में देखने को मिला।
यहां एक महिला ने अपनी उम्र लगभग दोगुनी दर्शाकर पिछले एक दशक तक लगातार वृद्धावस्था पेंशन का लाभ उठाया। इस पूरे प्रकरण ने न केवल सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया बल्कि उन वास्तविक बुजुर्गों के अधिकारों पर भी सवाल खड़े किए जो आज भी सहायता के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
36 की उम्र में 69 का दावा और 10 साल तक भुगतान
यह पूरा मामला बढ़पुरा ब्लॉक के विचारपुरा ग्राम पंचायत से जुड़ा हुआ है। यहां वार्षिक पात्रता परीक्षण के दौरान प्रधान प्रतिनिधि मुकेश कुमार को उमा देवी नामक महिला के पेंशन रिकॉर्ड में गड़बड़ी की भनक लगी। जब महिला के पहचान पत्र और कुटुंब रजिस्टर के अभिलेखों की पड़ताल की गई तो उसकी वास्तविक आयु केवल 46 वर्ष पाई गई। चौंकाने वाली बात यह है कि वर्ष 2015 में जब यह पेंशन मंजूर हुई थी तब वह महज 36 साल की थी जबकि दस्तावेजों में खुद को 69 वर्ष का बुजुर्ग दिखाकर स्वीकृति हासिल कर ली गई।
सिर्फ पेंशन रोकने से नाराज ग्रामीण अब चाहते हैं पाई-पाई की वसूली
मामले की आधिकारिक शिकायत जिलाधिकारी और समाज कल्याण दफ्तर तक पहुंचने के बाद विभाग ने उमा देवी को अपात्र घोषित करते हुए उनका मासिक भुगतान तुरंत बंद कर दिया। हालांकि स्थानीय प्रतिनिधि इस कदम को नाकाफी मान रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सिर्फ नाम काट देना काफी नहीं है बल्कि पिछले दस सालों में गलत तरीके से हड़पी गई पूरी सरकारी रकम की वसूली होनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई दूसरा व्यक्ति ऐसा छल करने की हिम्मत न जुटा सके।
विभागीय लापरवाही और साठगांठ पर गंभीर सवाल
जिला समाज कल्याण अधिकारी संध्यारानी बघेल के निर्देश पर बढ़पुरा के सहायक विकास अधिकारी वीरेश कुमार इस प्रकरण की विस्तृत जांच कर रहे हैं। इस जांच का मुख्य केंद्र यह है कि आखिर किन जाली प्रमाण पत्रों के दम पर पेंशन स्वीकृत हुई और हर साल होने वाले वार्षिक सत्यापन के दौरान जांचकर्ताओं की नजर इस फर्जीवाड़े से कैसे बची रही। यदि इसमें अधिकारियों या कर्मचारियों की मिलीभगत साबित होती है तो उन पर भी गाज गिरना तय माना जा रहा है।
पूरे जिले में पात्रता जांच की उठी मांग
इस घटना के सार्वजनिक होने के बाद जिले भर में चल रही सत्यापन प्रक्रिया की निष्पक्षता कटघरे में खड़ी हो गई है। लोगों का मानना है कि यदि सघन पड़ताल कराई जाए तो ऐसे कई और मामले सामने आ सकते हैं जहां जरूरतमंदों का हक मारकर फर्जी लाभार्थी सरकारी योजनाओं का फायदा उठा रहे हैं। प्रशासन के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती योजना को पारदर्शी बनाने और पात्र बुजुर्गों तक सही मदद पहुंचाने की है।