कॉर्बेट में नहीं रहा पर्यटकों का चहेता 'भोला टाइगर',शांत स्वभाव के लिए था मशहूर
उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क से वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक बेहद दुखद और झकझोर देने वाली खबर सामने आ रही है। कॉर्बेट की वादियों में आने वाले पर्यटकों और सफारी प्रेमियों के दिलों पर राज करने वाला हर का चहेता बाघ 'भोला टाइगर' अब हमारे बीच नहीं रहा है। अपनी अद्भुत खूबसूरती, विशालकाय कद-काठी और सबसे बढ़कर इंसानों और सफारी गाड़ियों के सामने आने पर भी कभी आक्रामक न होने वाले अपने बेहद शांत स्वभाव के लिए मशहूर इस बाघ ने पार्क के ढेला रेस्क्यू सेंटर में अपनी आखिरी सांस ली। 'भोला' की मौत की खबर जैसे ही वन्यजीव प्रेमियों, गाइडों और कॉर्बेट प्रशासन तक पहुंची, पूरे पार्क क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। पार्क के इतिहास में एक ऐसा दौर था जब हर पर्यटक की जुबान पर सिर्फ इसी टाइगर का नाम होता था, क्योंकि वह अपनी मस्तानी चाल से सफारी के दौरान पर्यटकों को आसानी से दर्शन दे देता था। आइए इस विस्तृत, भौगोलिक रूप से अनुकूलित और गहराई से रची गई रिपोर्ट में जानते हैं कि कॉर्बेट के इस लेजेंडरी 'भोला टाइगर' का जीवन कैसा था और अंतिम दिनों में उसकी सेहत क्यों बिगड़ी।
कौन था 'भोला टाइगर' और क्यों पर्यटकों की पहली पसंद था वह?
जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क की घनी झाड़ियों और खुले घास के मैदानों में कई बाघ रहते हैं, लेकिन हर बाघ की अपनी एक अलग पहचान और लोकप्रियता होती है। 'भोला' नाम का यह बाघ कॉर्बेट के इतिहास में उन गिने-चुने बाघों में शुमार था, जिन्हें लोग दूर-दूर से देखने के लिए आते थे। ढेला और झिरका जैसे जोन में घूमने वाले इस बाघ की सबसे बड़ी खासियत उसका असाधारण रूप से शांत और सौम्य स्वभाव था। जब कभी भी जिप्सी गाड़ियां उसके सामने आ जाती थीं, तो वह बाकी बाघों की तरह झल्लाने या भागने के बजाय बेहद इत्मीनान से रास्ते के बीचों-बीच टहलता हुआ नजर आता था। उसकी इसी बेफिक्र और राजाओं जैसी चाल ने उसे पर्यटकों के बीच 'भोला' उपनाम दिला दिया था। सफारी के दौरान जब कभी किसी पर्यटक को भोला के दर्शन हो जाते थे, तो उनका पूरा ट्रिप सफल माना जाता था। सोशल मीडिया पर उसकी तस्वीरें और वीडियो हमेशा से वायरल होते रहे हैं, जिन्हें देखकर लोग उसकी शान पर फिदा हो जाते थे।
उम्र के ढलान और आपसी संघर्ष के बाद शुरू हुई थी कठिनाइयां
प्रकृति का एक अटल नियम है कि जंगल के राजा को भी एक न एक दिन उम्र के इस पड़ाव से गुजरना पड़ता है, जहां उसकी शारीरिक ताकत कमजोर होने लगती है। पिछले कुछ समय से 'भोला टाइगर' की उम्र काफी अधिक हो चुकी थी और जंगलों में युवा तथा ताकतवर बाघों के आ जाने के कारण उसे अपनी टेरिटरी बचाने के लिए कई संघर्षों का सामना करना पड़ा था। उम्र के इस पड़ाव पर जब उसकी शिकार करने की क्षमता कम होने लगी और वह कमजोर पड़ने लगा, तो कॉर्बेट प्रशासन की नजर लगातार उस पर बनी हुई थी। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक, एक बुजुर्ग बाघ के लिए जंगल के कठोर नियमों के बीच जीवित रहना बेहद कठिन हो जाता है, खासकर जब अन्य आक्रामक नर बाघ उसे खदेड़ने की कोशिश करते हैं। इसी दौरान वन विभाग के अधिकारियों ने उसकी बिगड़ती सेहत को भांपते हुए उसे सुरक्षित रखने की दिशा में सोचना शुरू कर दिया था।
ढेला रेस्क्यू सेंटर में इलाज और आखिरी वक्त की जद्दोजहद
जब कॉर्बेट प्रशासन और वन्यजीव चिकित्सकों की टीम ने देखा कि 'भोला' अब प्राकृतिक रूप से जंगल में शिकार करने में असमर्थ होता जा रहा है और उसकी शारीरिक हालत लगातार गिरती जा रही है, तो उसे सुरक्षित रूप से रेस्क्यू करने का निर्णय लिया गया। पार्क के नियमों और विशेषज्ञों की देखरेख में उसे सुरक्षित पकड़कर ढेला रेस्क्यू सेंटर लाया गया, जहाँ देश के बेहतरीन पशु चिकित्सक उसकी देखभाल और इलाज में जुट गए थे। रेस्क्यू सेंटर के बाड़े में उसे विशेष देखरेख में रखा गया ताकि उसे समय पर पोषक आहार और चिकित्सीय सहायता मिल सके। हालांकि, उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुके इस बाघ के शरीर के कई अंगों ने काम करना धीमा कर दिया था। डॉक्टरों की तमाम कोशिशों और लाख जद्दोजहद के बाद भी वह कमजोरी से उबर नहीं सका और ढेला रेस्क्यू सेंटर में ही उसने अंतिम सांस ली।
कॉर्बेट के इतिहास में हमेशा अमर रहेगा 'भोला' का नाम
'भोला टाइगर' की मौत के साथ ही कॉर्बेट नेशनल पार्क के एक स्वर्णिम और बेहद लोकप्रिय अध्याय का अंत हो गया है। पार्क के जिप्सी ड्राइवर, गाइड, वन विभाग के कर्मचारी और देश-विदेश से आने वाले वन्यजीव प्रेमी आज इस बात को लेकर गमगीन हैं कि उनका सबसे प्यारा दोस्त अब कभी जंगलों में टहलता हुआ नजर नहीं आएगा। सोशल मीडिया पर पिछले कुछ घंटों से वन्यजीव प्रेमियों द्वारा 'भोला' को श्रद्धांजलि देने वाले पोस्ट्स की बाढ़ आ गई है, जिसमें लोग उसके साथ बिताए गए पुराने सफारी पलों को याद कर रहे हैं। कॉर्बेट प्रशासन का कहना है कि भोला का इस तरह जाना एक बड़ी क्षति है, लेकिन उसने जिस तरह पर्यटकों को वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूक करने में अपनी भूमिका निभाई, वह हमेशा याद रखा जाएगा। भले ही वह अब भौतिक रूप से इस दुनिया में नहीं रहा, लेकिन कॉर्बेट की हवाओं और पगडंडियों में 'भोला टाइगर' की यादें हमेशा अमर रहेंगी।