किराए की डिग्री पर मेडिकल स्टोर चलाने वालों की खैर नहीं, यूपी सरकार के नए फरमान से मची खलबली

किराए की डिग्री पर मेडिकल स्टोर चलाने वालों की खैर नहीं, यूपी सरकार के नए फरमान से मची खलबली

उत्तर प्रदेश में दवाओं की ओवर-रेटिंग, नकली दवाओं के काले कारोबार और मेडिकल स्टोर संचालकों की मनमानी पर नकेल कसने के लिए स्वास्थ्य प्रशासन ने एक अभूतपूर्व कदम उठाया है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) ने प्रदेश भर की सभी रिटेल फार्मेसियों के लिए कड़े नियम लागू करते हुए अपनी अलग सार्वजनिक वेबसाइट बनाना अनिवार्य कर दिया है। इस नई व्यवस्था के तहत अब हर मेडिकल स्टोर को अपने काउंटर पर वेबसाइट का लिंक और क्यूआर कोड लगाना होगा, ताकि कोई भी ग्राहक एक क्लिक में दवा के असली दाम, स्टॉक और फार्मासिस्ट की पूरी कुंडली जांच सके।

अलीगढ़ के औषधि निरीक्षक दीपक लोधी के अनुसार, उत्तर प्रदेश के खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन आयुक्त द्वारा इस बाबत विस्तृत दिशानिर्देश जारी कर दिए गए हैं। नए नियमों के मुताबिक, प्रत्येक फार्मेसी को अपनी वेबसाइट पर दुकान का नाम, ड्रग लाइसेंस नंबर, लाइसेंस धारक का नाम व पता स्पष्ट तौर पर दर्ज करना होगा। इसके अलावा मेडिकल स्टोर पर तैनात अधिकृत फार्मासिस्ट का नाम, काउंसिल रजिस्ट्रेशन नंबर और उसकी हालिया फोटो भी अपलोड करनी होगी। इससे डिग्री किराए पर देकर बिना फार्मासिस्ट के दवा की दुकानें चलाने के फर्जीवाड़े पर पूरी तरह रोक लगेगी। साथ ही मेडिकल स्टोर पर उपलब्ध दवाओं के स्टॉक की जानकारी हर हफ्ते अनिवार्य रूप से अपडेट करनी होगी।

अस्पतालों के भीतर चलने वाली इन-हाउस फार्मेसियों को लेकर प्रशासन ने और भी ज्यादा सख्ती दिखाई है। चूंकि भर्ती मरीजों और उनके तीमारदारों के पास अस्पताल के बाहर से दवा खरीदने का विकल्प बेहद सीमित होता है, इसलिए अस्पताल परिसर के मेडिकल स्टोर्स को दवाओं की खरीद दर (परचेज प्राइस) और मरीजों को बेची जाने वाली बिक्री दर (एमआरपी) दोनों को वेबसाइट पर सार्वजनिक करना होगा। इसके साथ ही दवा निर्माता कंपनी का नाम, ब्रांड नाम और उसके साल्ट यानी जेनेरिक नाम का उल्लेख करना भी जरूरी होगा, ताकि मरीजों को यह पता रहे कि अस्पताल उनसे दवाओं पर कितना मुनाफा वसूल रहा है।

ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO)-2013 के प्रावधानों का हवाला देते हुए औषधि विभाग ने साफ किया है कि रिटेलरों और डीलरों को निर्माता कंपनी की वास्तविक मूल्य सूची को दुकान के प्रमुख हिस्से में चस्पा करना होगा। विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह कोई नया मूल्य नियंत्रण कानून नहीं है, बल्कि जनहित में फार्मेसियों द्वारा सूचनाओं के स्व-प्रकटीकरण (सेल्फ-डिस्क्लोजर) का पारदर्शी मॉडल है। इसका सीधा मकसद प्रदेश के आम नागरिकों और मरीजों तक सुरक्षित, मानक और वाजिब दरों पर जरूरी दवाएं पहुंचाना है।