अमीर आलम और नवाजिश की 'विदाई' से क्या मुस्लिम वोटों से पूरी तरह पैदल हो गए सांसद आजाद
भारतीय राजनीति के गलियारों और विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश के सियासी अखाड़े में इन दिनों अगर किसी सबसे चर्चित और चौंकाने वाले राजनीतिक घटनाक्रम की सबसे ज्यादा चर्चा है, तो वह नगीना से सांसद और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद 'रावण' से जुड़ा हुआ है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित-मुस्लिम समीकरण (Dalit-Muslim Equation) के सहारे अपनी एक मजबूत सियासी पहचान बनाने और खुद को बहुजन समाज के एक बड़े विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे चंद्रशेखर आजाद के खेमे से इन दिनों बड़े झटके लगातार मिल रहे हैं। पश्चिम यूपी के कद्दावर मुस्लिम राजनीतिक परिवारों में शुमार अमीर आलम और उनके बेटे नवाजिश आलम की पार्टी से विदाई या किनारा करने के बाद सियासी गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या चंद्रशेखर का यह बहुचर्चित 'खेला' अब पूरी तरह से समाप्त हो गया है? क्या इन दिग्गज मुस्लिम नेताओं के अलग होने से सांसद आजाद अपने सबसे बड़े वोट बैंक यानी मुस्लिम मतों से पूरी तरह से पैदल हो चुके हैं? आइए इस विशेष राजनीतिक और चुनावी समीक्षा रिपोर्ट में गहराई से जानते हैं कि इस सियासी उठापटक के पीछे की पूरी इनसाइड स्टोरी क्या है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आगामी समीकरणों पर इसका कितना गहरा प्रभाव पड़ने वाला है।
पश्चिमी यूपी में दलित-मुस्लिम गठजोड़ की सियासत और चंद्रशेखर के सामने खड़े हुए नए संकट
चंद्रशेखर आजाद ने जब अपनी राजनीतिक पार्टी की शुरुआत की थी, तब उनका मुख्य फोकस भीम आर्मी के कैडर के साथ-साथ राज्य के उन मुस्लिम युवाओं को जोड़ना था जो पारंपरिक दलों से थोड़े नाराज चल रहे थे। लोकसभा चुनाव के दौरान नगीना सीट से ऐतिहासिक जीत दर्ज करने के बाद चंद्रशेखर की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पूरे उत्तर प्रदेश और देश स्तर पर फैल गई थीं, और वे लगातार यह संदेश दे रहे थे कि वे दलितों के साथ-साथ पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के सबसे बड़े मसीहा बनकर उभर रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, शामली, सहारनपुर और बिजनौर बेल्ट में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या किसी भी चुनाव के नतीजे को पूरी तरह से पलटने की ताकत रखती है। इसी सियासी नब्ज को पहचानते हुए चंद्रशेखर ने क्षेत्र के कई बड़े और रसूखदार मुस्लिम परिवारों को अपनी पार्टी से जोड़ने में सफलता हासिल की थी, ताकि वे बहुसंख्यक वोट बैंक के सामने एक मजबूत राजनीतिक चुनौती पेश कर सकें। हालांकि, राजनीति की बिसात जितनी बाहर से सरल दिखाई देती है, अंदरखाने उतनी ही पेचीदगियां और अंतर्विरोध भरे होते हैं, और हालिया घटनाक्रमों ने यह साबित कर दिया है कि क्षेत्रीय क्षत्रपों को अपने साथ लंबे समय तक बांधे रखना किसी भी युवा नेता के लिए आसान काम नहीं है।
अमीर आलम और नवाजिश आलम परिवार का प्रभाव: क्यों माना जा रहा है इस विदाई को चंद्रशेखर के लिए बड़ा झटका?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुजफ्फरनगर और शामली क्षेत्र का 'आलम परिवार' किसी परिचय का मोहताज नहीं है, जिनका इस पूरे इलाके के मुस्लिम मतदाताओं पर एकछत्र प्रभाव और पुराना राजनीतिक रसूख रहा है। अमीर आलम और उनके परिवार के पास जमीनी स्तर पर मजबूत पकड़, कार्यकर्ताओं का बड़ा नेटवर्क और क्षेत्र की हर एक विधानसभा सीट की गहरी समझ है। जब इस परिवार के सदस्य चंद्रशेखर आजाद के साथ जुड़े थे, तो राजनीतिक पंडितों ने यह मान लिया था कि आजाद समाज पार्टी को पश्चिमी यूपी में एक ऐसा मजबूत और धनी सियासी कंधा मिल गया है जिसके सहारे वे आने वाले विधानसभा चुनावों में बड़ा उलटफेर कर सकते हैं। लेकिन अचानक से इस परिवार का पार्टी से दूरी बनाना या किनारा कर लेना चंद्रशेखर के उस बड़े राजनीतिक नैरेटिव को गहरा आघात पहुंचाता है जिसमें वे खुद को मुस्लिम समाज के सबसे बड़े रहनुमा के रूप में प्रोजेक्ट कर रहे थे। जानकारों का यह मानना है कि जब ऐसे कद्दावर और जमीनी नेता किसी दल का साथ छोड़ते हैं, तो उनके साथ-साथ उस वर्ग का एक बड़ा कैडर भी वैचारिक रूप से छिटक जाता है, जिसकी भरपाई करना किसी भी नए दल के लिए बेहद कठिन चुनौती बन जाता है।
क्या वाकई मुस्लिम वोटों से 'पैदल' हो गए हैं सांसद आजाद या यह केवल एक तात्कालिक सियासी झटका है?
इस सवाल पर राजनीतिक विश्लेषकों की राय बंटी हुई है कि क्या अमीर आलम जैसे दिग्गजों के जाने से चंद्रशेखर पूरी तरह से हाशिए पर चले जाएंगे या फिर उनका युवा करिश्मा अभी भी काम करेगा। एक तरफ जहां विरोधी दल यह मान रहे हैं कि चंद्रशेखर की पार्टी का दायरा अब केवल कुछ चुनिंदा इलाकों या व्यक्तिगत लोकप्रियता तक सिमट कर रह गया है, वहीं दूसरी तरफ उनके समर्थकों का यह तर्क है कि चंद्रशेखर की व्यक्तिगत अपील अभी भी जमीन पर कायम है और युवा वोटर उनकी निष्पक्षता पर भरोसा करते हैं। हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जटिल जातीय और सांप्रदायिक समीकरणों में केवल भाषणों और रैलियों से चुनाव नहीं जीते जा सकते, बल्कि इसके लिए मजबूत संगठन, बूथ स्तर के नेता और वित्तीय संसाधनों की जरूरत होती है जो अमीर आलम जैसे घराने मुहैया कराते थे। यदि चंद्रशेखर ने समय रहते इस डैमेज को कंट्रोल नहीं किया, तो उनकी पार्टी के विस्तार की रफ्तार पर ब्रेक लगना तय माना जा रहा है।
आने वाले चुनावों पर इसका असर: क्या अपनी खोई जमीन वापस पाने में कामयाब होंगे चंद्रशेखर आजाद?
उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से करवट लेती रही है और यहां कब कौन सा समीकरण बदल जाए, इसका अंदाजा लगाना बड़े-बड़े रणनीतिकारों के लिए भी मुश्किल होता है। चंद्रशेखर आजाद के सामने अब सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि वे पश्चिमी यूपी के अन्य क्षेत्रीय नेताओं और मुस्लिम चेहरों को अपने साथ जोड़कर इस खालीपन को कैसे भरते हैं। उनकी आक्रामक शैली और संसद में उठाए जाने वाले मुद्दों ने उन्हें राष्ट्रीय फलक पर जरूर ला खड़ा किया है, लेकिन जमीनी राजनीति में টিকে रहने के लिए स्थानीय क्षत्रपों का साथ होना उतना ही जरूरी है जितना कि जनता का समर्थन। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि चंद्रशेखर इस राजनीतिक संकट से किस प्रकार पार पाते हैं और क्या वे एक बार फिर से दलित-मुस्लिम समीकरण के अपने पुराने फॉर्मूले को नए सिरे से जिंदा कर पाते हैं या नहीं।