लखनऊ अग्निकांड: 10 साल पहले जिस इमारत को गिराने का हुआ था आदेश, जानिए एलडीए (LDA) में किसने और क्यों पलटा वो फैसला?
लखनऊ : उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज में सोमवार को हुए भीषण अग्निकांड (Lucknow Fire Tragedy) ने जहां 15 मासूमों की जान ले ली, वहीं अब इस हादसे के बाद सरकारी विभागों की एक ऐसी खौफनाक और चौंकाने वाली लापरवाही सामने आई है, जिसने पूरे प्रशासनिक अमले को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
अग्निकांड की शिकार हुई इस तीन मंजिला इमारत से जुड़े पुराने दस्तावेज़ों की पड़ताल में खुलासा हुआ है कि लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने आज से ठीक 10 साल पहले यानी साल 2016 में ही इस पूरी बिल्डिंग को 'अवैध' घोषित कर इसे जमींदोज (ध्वस्त) करने का आधिकारिक आदेश जारी किया था। लेकिन, एक रहस्यमयी खेल के तहत महज दो महीने के भीतर इस आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर एलडीए में बैठे किस रसूखदार के इशारे पर यह मौत की इमारत 12 सालों तक सीना ताने खड़ी रही?
आवंटन से लेकर अवैध कब्जे तक की पूरी 'टाइमलाइन'
सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, इस विवादित और हादसे का शिकार हुई बिल्डिंग का इतिहास कुछ इस प्रकार है:
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11 जुलाई 1980: अलीगंज योजना के सेक्टर-D स्थित भवन संख्या एमएस/102/डी को पहली बार लॉटरी सिस्टम के जरिए विजय कुमार को किराया-क्रय पद्धति पर आवंटित किया गया था।
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साल 2005: इस भवन की रजिस्ट्री (विक्रय विलेख) विजय कुमार और उनकी पत्नी उषा के नाम दर्ज हुई।
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19 जनवरी 2013: विजय कुमार ने इस करीब 1992 वर्गफीट क्षेत्रफल वाले भवन को वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला और सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला नाम के व्यक्तियों को बेच दिया।
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20 अगस्त 2014: नए मालिकों ने एलडीए की 'स्वतः मानचित्र योजना' का लाभ उठाकर इस प्लॉट का नक्शा पूरी तरह आवासीय उपयोग (Residential Use) के लिए पास करवाया था।
सिर्फ 2 महीने में कैसे पलट गया 'ध्वस्तीकरण का आदेश'?
नक्शा आवासीय पास कराने के बाद मालिकों ने नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए इस पर एक बड़ा अनधिकृत और व्यावसायिक (Commercial) निर्माण खड़ा कर लिया।
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जब मामले ने तूल पकड़ा, तो एलडीए ने वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला के खिलाफ मुकदमा संख्या-08/2016 दर्ज किया।
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गहन जांच के बाद एलडीए के सक्षम विहित प्राधिकारी ने 10 मई 2016 को इस अवैध निर्माण को गिराने (ध्वस्तीकरण आदेश) का अंतिम फैसला सुनाया।
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रहस्यमयी यू-टर्न: लेकिन भ्रष्टाचार और रसूख के चलते इस आदेश के जारी होने के ठीक दो महीने के भीतर यानी 5 जुलाई 2016 को एलडीए ने बिना किसी ठोस आधार के इस ध्वस्तीकरण आदेश को खुद ही निरस्त (कैंसल) कर दिया।
इसके बाद पिछले 12 सालों तक यह अवैध कॉम्प्लेक्स बिना किसी डर के संचालित होता रहा। इसमें एनिमेशन सेंटर, गेमिंग जोन और पेट शॉप जैसी भारी कमर्शियल गतिविधियां धड़ल्ले से चलती रहीं। इस दौरान कई बार स्थानीय लोगों ने शिकायतें कीं, फाइलें भी चलीं, लेकिन जमीन पर कोई एक्शन नहीं हुआ।
एलडीए (LDA) के 30 से अधिक अधिकारी और इंजीनियर जांच के घेरे में
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कड़े रुख के बाद अब एलडीए के भीतर छिपे सफेदपोशों की तलाश शुरू हो गई है। एलडीए की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि साल 2014 से लेकर 2026 के बीच इस अलीगंज क्षेत्र में लगभग 30 से अधिक विहित प्राधिकारी, जोनल अधिकारी, अधिशासी अभियंता (XEN) और जूनियर इंजीनियर (JE) तैनात रहे। इन 12 वर्षों में जिन-जिन अधिकारियों ने शिकायतों को दबाया और अवैध कमर्शियल एक्टिविटी को बढ़ावा दिया, उन सभी की भूमिका की बारीकी से स्क्रूटनी की जा रही है और जल्द ही इन पर बड़ी गाज गिर सकती है।
बेसमेंट में बनी पेट शॉप से भड़की थी आग
मुख्य अग्निशमन अधिकारी (CFO) अंकुश मित्तल के अनुसार, इस इमारत के बेसमेंट और ग्राउंड फ्लोर पर एक पेट शॉप (पालतू जानवरों की दुकान) और क्लीनिक संचालित हो रहा था। फर्स्ट फ्लोर पर इसी दुकान का भारी मात्रा में स्टॉक और सामान भरा हुआ था। शुरुआती तकनीकी जांच में आशंका जताई गई है कि फर्स्ट फ्लोर पर लगे एसी (AC) या बिजली बोर्ड में हुए शॉर्ट सर्किट के कारण ही आग भड़की, जिसने पूरी बिल्डिंग को अपनी चपेट में ले लिया।
मुआवजे और गिरफ्तारी का अपडेट: हादसे की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्वयं घटनास्थल का दौरा किया है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए बिल्डिंग के मुख्य मालिक वीरेंद्र प्रताप शुक्ला समेत चार लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। साथ ही, राज्य सरकार की ओर से मृतकों के आश्रितों को ₹5-5 लाख और गंभीर रूप से घायलों को ₹50-50 हजार की आर्थिक सहायता देने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।