उत्तराखंड के जंगलों में बढ़ा खौफ, कहीं बाघ का हमला तो कहीं भालू ने ली महिला की जान

उत्तराखंड के जंगलों में बढ़ा खौफ, कहीं बाघ का हमला तो कहीं भालू ने ली महिला की जान

पहाड़ी इलाकों में जंगल हमेशा से स्थानीय ग्रामीणों की आजीविका और जीवनचर्या का अहम हिस्सा रहे हैं। मवेशियों के लिए चारा जुटाना, जलावन की लकड़ी लाना और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए गांव के लोग पूरी तरह जंगलों पर निर्भर रहते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से यही घने जंगल ग्रामीणों के लिए जीवन का सहारा बनने के बजाय डर और दहशत का दूसरा नाम बनते जा रहे हैं।

उत्तराखंड के चमोली जिले में हाल के दिनों में सामने आई भालू और बाघ की वारदातों ने इस गंभीर खतरे को एक बार फिर से उजागर कर दिया है, जिससे पहाड़ी जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

पाडुली गांव में बाघ का हमला और पोखरी की दर्दनाक घटना

अभी पोखरी क्षेत्र में भालू के खौफनाक हमले की यादें लोगों के दिलों से मिटी भी नहीं थीं कि जिला मुख्यालय गोपेश्वर के पास स्थित पाडुली गांव में बाघ ने दो महिलाओं पर हमला कर दिया। हालांकि गनीमत यह रही कि दोनों महिलाएं अपनी जान बचाने में कामयाब रहीं, लेकिन इस घटना के बाद से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई है।

इससे पहले पोखरी विकासखंड के नेल-सिदेली गांव में हुई घटना ने सबको झकझोर दिया था, जहां जंगल गईं महिलाओं पर भालू ने अचानक हमला कर दिया था। जान बचाने की भागदौड़ में एक महिला गहरी चट्टान से नीचे जा गिरी और उसकी दर्दनाक मौत हो गई, जबकि दूसरी महिला गंभीर रूप से घायल हो गई थी।

आजीविका और सुरक्षा के बीच फंसी पहाड़ी महिलाओं की जिंदगी

पहाड़ के गांवों में कृषि और पशुपालन का पूरा ताना-बाना जंगलों से जुड़ा हुआ है, और इन कामों का सबसे बड़ा जिम्मा महिलाओं के कंधों पर होता है। चारा-पत्ती और लकड़ी लेने के लिए महिलाओं को रोजाना जंगल जाना ही पड़ता है, लेकिन वन्यजीवों की बढ़ती दखलंदाजी ने उनके सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।

पाडुली गांव की घटना के बाद अब महिलाओं ने अकेले जंगल जाना बंद कर दिया है और समूहों में जाने के बावजूद उनके मन में हर वक्त अनहोनी का डर सताता रहता है। ग्रामीणों का कहना है कि अब जंगल जाने से पहले उन्हें कई बार सोचना पड़ता है क्योंकि यह उनकी जरूरत के साथ-साथ जान का जोखिम भी बन चुका है।