Pm मोदी और शी जिनपिंग की ग्लोबल केमिस्ट्री से क्या सुलझ पाएगा भारत-चीन का पुराना विवाद

Pm मोदी और शी जिनपिंग की ग्लोबल केमिस्ट्री से क्या सुलझ पाएगा भारत-चीन का पुराना विवाद

एशियाई महाद्वीप की दो सबसे बड़ी और उभरती हुई महाशक्तियों यानी भारत और चीन के बीच के रिश्तों की खटास किसी से छिपी नहीं है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर फौजी जमावड़े और तनाव के साए के बीच अब एक बार फिर से इस बात की सुगबुगाहट तेज हो गई है कि क्या दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर कोई बड़ा कूटनीतिक बदलाव देखने को मिल सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिखने वाली बॉडी लैंग्वेज और कूटनीतिक केमिस्ट्री को लेकर दुनिया भर के राजनीतिक विश्लेषक एक बार फिर से कयास लगाने लगे हैं। क्या ड्रैगन के साथ चली आ रही इस लंबी तनातनी के बीच आपसी संवाद के रास्ते से दशकों पुराने सीमा विवाद का कोई स्थाई हल निकल पाएगा या फिर यह केवल कूटनीतिक शिष्टाचार बनकर रह जाएगा? वैश्विक शांति और आर्थिक स्थिरता के लिहाज से इस सवाल का जवाब न केवल भारत और चीन बल्कि पूरी दुनिया के लिए बेहद मायने रखता है, क्योंकि इन दोनों देशों के संबंधों पर ग्लोबल ट्रेड और सप्लाई चेन का भविष्य बहुत हद तक टिका हुआ है।

क्या है वर्तमान भारत-चीन संबंधों का सच और क्यों फिर गरमाया है कूटनीतिक गलियारों का बाजार?

पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी और सीमाई इलाकों की घटनाओं के बाद से भारत और चीन के आपसी राजनयिक और आर्थिक संबंध उस दौर के सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुंच गए थे। भारत ने सुरक्षा कारणों से चीनी निवेश पर कड़े प्रतिबंध लगाए, कई मोबाइल ऐप्स पर पाबंदी लगाई और अपनी सामरिक तैयारियों को मजबूत करने के लिए एलएसी पर भारी संख्या में सैनिकों व आधुनिक हथियारों की तैनाती कर दी। हालांकि, कूटनीतिक मोर्चे पर दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों और सैन्य कमांडरों के बीच बातचीत के दौर कभी पूरी तरह बंद नहीं हुए। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और ब्रिक्स (BRICS) जैसे मंचों पर पीएम मोदी और शी जिनपिंग के बीच हुई संक्षिप्त मुलाकातों और आपसी संवाद ने यह उम्मीद जगाई है कि शायद दोनों देश युद्ध या संघर्ष के बजाय टेबल टॉक के जरिए अविश्वास की इस दीवार को गिराने की दिशा में कुछ सकारात्मक कदम बढ़ा सकते हैं।

पीएम मोदी और शी जिनपिंग की वैश्विक केमिस्ट्री: क्या व्यक्तिगत कूटनीति से पिघलेगी कूटनीतिक बर्फ?

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का यह मानना है कि कई बार दो देशों के बीच के जटिल गतिरोधों को सुलझाने में शीर्ष नेताओं की आपसी समझ और व्यक्तिगत कूटनीति बहुत बड़ा रोल अदा करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मजबूत और राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखने वाली शैली के सामने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी भारत की वैश्विक कूटनीति के बढ़ते प्रभाव को नजरअंदाज नहीं कर पा रहे हैं। भारत आज दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के साथ-साथ ग्लोबल साउथ की आवाज बन चुका है, जिसे चीन अच्छी तरह समझता है। ऐसे में यदि दोनों नेता द्विपक्षीय बैठकों के दौरान आपसी विश्वास बहाली के उपायों पर गंभीरता से विचार करते हैं, तो सीमा पर सैनिकों के पीछे हटने (Disengagement) और तनाव कम करने की प्रक्रिया को एक नई गति मिल सकती है, जिससे दोनों ही देशों के व्यापारिक हितों को भी बढ़ावा मिलेगा।

आर्थिक निर्भरता और वैश्विक भू-राजनीति: क्या मजबूरी बन चुकी है आपसी शांति?

भले ही भारत और चीन के बीच राजनीतिक और रणनीतिक मोर्चे पर तनातनी जारी हो, लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापारिक आंकड़े यह बताते हैं कि वे एक-दूसरे के बाजार से पूरी तरह मुंह नहीं मोड़ सकते। भारत अपनी कई औद्योगिक और तकनीकी जरूरतों के लिए आज भी बड़े पैमाने पर चीनी कच्चे माल और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स पर निर्भर है, जबकि चीनी कंपनियों के लिए भी भारत का विशाल उपभोक्ता बाजार बहुत बड़ा वरदान है। इसके अलावा, बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों—विशेषकर पश्चिमी देशों के साथ चीन के बढ़ते तनाव और अमेरिका के साथ भारत के गहरे होते रणनीतिक रिश्तों—के बीच बीजिंग यह अच्छी तरह जानता है कि भारत को हमेशा के लिए विरोधी बनाकर रखना उसके दीर्घकालिक आर्थिक हितों में नहीं है। यही कारण है कि कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के जरिए एक सम्मानजनक समाधान खोजने की कोशिशें लगातार पर्दे के पीछे चल रही हैं।

क्या सुलझ पाएगा पुराना सीमा विवाद या भविष्य में चुनौतियां रहेंगी बरकरार?

यह सवाल आज भी सबसे बड़ा और जटिल बना हुआ है कि क्या पीएम मोदी और शी जिनपिंग की तथाकथित केमिस्ट्री वाकई एलएसी के उन पेचीदा मुद्दों को सुलझा सकती है, जिन्हें दशकों से नहीं सुलझाया जा सका है। जानकारों का मानना है कि जब तक चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अपनी आक्रामक हरकतों को पूरी तरह बंद नहीं करता और पुरानी यथास्थिति (Status Quo) को बहाल करने पर राजी नहीं होता, तब तक केवल मुस्कराहटों और हाथ मिलाने से स्थायी शांति की उम्मीद करना बेमानी होगा। भारत ने अपनी नीति बिल्कुल स्पष्ट कर दी है कि सीमा पर शांति और अमन-चैन बहाल होने के बाद ही द्विपक्षीय रिश्तों के अन्य अध्यायों को आगे बढ़ाया जा सकता है। आने वाले समय में दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की आगामी बैठकों और दौरों से यह साफ हो पाएगा कि ड्रैगन के साथ दोस्ती का यह नया दौर वास्तव में धरातल पर उतरेगा या फिर यह कूटनीतिक पांसों का एक और दौर बनकर रह जाएगा।