ईरान को मिल गया अमेरिकी जेट का काल, रूस से खरीदे Su-35 लड़ाकू विमान
मध्य पूर्व (Middle East) के बेहद संवेदनशील और तनावपूर्ण माहौल के बीच एक ऐसी बड़ी और रणनीतिक सैन्य खबर सामने आई है जिसने वाशिंगटन से लेकर तेल अवीव तक हलचल मचा दी है। लंबे समय से चल रही अटकलों और रक्षा समझौतों पर मुहर लगाते हुए ईरान की वायुसेना को रूस से उसके सबसे आधुनिक और घातक 'सुखोई Su-35' (Sukhoi Su-35) 4.5 जनरेशन लड़ाकू विमानों की पहली खेप मिल गई है। अमेरिकी और इजराइली फाइटर जेट्स के मुकाबले के लिए ईरान का यह कदम बेहद निर्णायक माना जा रहा है। पश्चिम के कड़े आर्थिक और सैन्य प्रतिबंधों के बावजूद रूस और ईरान के बीच गहराते इस रक्षा गठबंधन ने क्षेत्र के सामरिक संतुलन को रातों-रात बदल कर रख दिया है। इन घातक विमानों के ईरानी हवाई क्षेत्र में शामिल होते ही अब अमेरिकी वायुसेना के F-16, F-15 और यहां तक कि इजराइल के स्टील्थ F-35 विमानों के लिए भी ईरानी आसमान में मनमानी करना नामुमकिन जैसा हो जाएगा।
ईरान की वायुसेना पिछले कई दशकों से पुराने और सेवा से बाहर होने के कगार पर पहुंचे अमेरिकी F-4 फैंटम और F-14 टॉमकैट विमानों के भरोसे अपनी सीमाओं की रक्षा कर रही थी। हालांकि, ईरान ने मिसाइल और ड्रोन तकनीक में अभूतपूर्व प्रगति की है, लेकिन एक आधुनिक और शक्तिशाली एयर-टू-एयर फाइटर जेट की कमी उसे हमेशा खलती थी। रूस से Su-35 की आपूर्ति के बाद ईरान की यह सबसे बड़ी और पुरानी कमजोरी अब हमेशा के लिए खत्म हो चुकी है। यह डील न केवल ईरान की हवाई रक्षा प्रणाली को एक अभेद्य कवच प्रदान करती है, बल्कि यह इस बात का भी प्रत्यक्ष प्रमाण है कि मास्को और तेहरान का यह गठजोड़ पश्चिमी देशों के दबदबे को खुली चुनौती देने के लिए पूरी तरह तैयार है।
हवा का असली सिकंदर: जानिए क्यों Su-35 को माना जाता है अमेरिकी स्टील्थ जेट्स का सबसे बड़ा दुश्मन
रूस का सुखोई Su-35 सुपर-मैन्युवरेबल 4.5 जनरेशन का एक ऐसा मल्टी-रोल लड़ाकू विमान है, जिसे विशेष रूप से दुश्मन के आधुनिक लड़ाकू विमानों को हवा में ही खोजकर तबाह करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें दो शक्तिशाली 'थ्रस्ट-वेक्टरिंग' (Thrust-Vectoring) इंजन लगे हैं, जो इसे हवा में बेहद असंभव और तेज मोड़ लेने की क्षमता प्रदान करते हैं। यही कारण है कि 'डॉगफाइट' (आसमान में आमने-सामने की हवाई भिड़ंत) के मामले में Su-35 को दुनिया का सबसे खतरनाक और चपल फाइटर जेट माना जाता है। इसके पंखों की संरचना और इसकी गति इसे 2.2 मैका (ध्वनि की गति से दो गुने से भी अधिक) की रफ्तार से उड़ान भरने की इजाजत देती है।
इसके अलावा, Su-35 में लगा 'इरबिस-ई' (Irbis-E) पैसिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (PESA) रडार सिस्टम बेहद शक्तिशाली है। यह रडार 400 किलोमीटर की दूरी से ही एक साथ 30 से अधिक हवाई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है और उनमें से 8 सबसे खतरनाक लक्ष्यों पर एक साथ मिसाइलें दागने की क्षमता रखता है। यही नहीं, यह रडार अमेरिका के F-35 जैसे स्टील्थ (रडार से बचने वाले) विमानों को भी काफी दूरी से पकड़ने में सक्षम माना जाता है। इसमें लगाई जाने वाली लंबे दायरे की आर-37एम (R-37M) और आर-77 (R-77) एयर-टू-एयर मिसाइलें दुश्मन के टैंकर और अवाक्स (AWACS) विमानों को बिना पास आए ही मार गिरा सकती हैं, जिससे ईरानी वायुसेना की आक्रामक क्षमता कई गुना बढ़ गई है।
अमेरिका और इजराइल की बढ़ी टेंशन: मध्य पूर्व में बिगड़ेगा सामरिक संतुलन
रूस द्वारा ईरान को इन उन्नत सुपरसोनिक लड़ाकू विमानों की डिलीवरी ने अमेरिकी पेंटागन और इजराइली रक्षा प्रतिष्ठानों में भारी खलबली पैदा कर दी है। अब तक मध्य पूर्व के आसमान में अमेरिका और इजराइल की वायुसेना को पूर्ण हवाई श्रेष्ठता (Air Superiority) हासिल थी। इजराइली वायुसेना जब चाहती थी, तब पड़ोसी देशों के इलाकों में घुसकर एयर स्ट्राइक कर देती थी, लेकिन ईरान के पास Su-35 आने के बाद यह समीकरण पूरी तरह पलट गया है। यदि इजराइल या अमेरिका ईरान के परमाणु ठिकानों पर किसी प्रकार के हवाई हमले की योजना बनाते हैं, तो उन्हें अब इन रूसी सुखोई जेट्स के भीषण प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा।
सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि ईरान केवल Su-35 जेट्स पर ही नहीं रुकने वाला है, बल्कि इस सौदे के हिस्से के रूप में उसे रूस से उन्नत 'S-400' मिसाइल डिफेंस सिस्टम और अटैक हेलीकॉप्टरों की भी आपूर्ति मिल सकती है। इसके बदले में ईरान ने रूस को यूक्रेन युद्ध के दौरान हजारों की संख्या में 'शाहेद' (Shahed) सुसाइड ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक मुहैया कराई है। यह 'लेन-देन' की रक्षा रणनीति दोनों देशों को एक-दूसरे के बेहद करीब ले आई है, जिसने पश्चिमी देशों की पाबंदियों और प्रतिबंधों की नीति को पूरी तरह से निष्प्रभावी साबित कर दिया है।
तेहरान का नया मास्टरस्ट्रोक: मजबूत हुई हवाई सुरक्षा और भविष्य के नए समीकरण
ईरानी रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि Su-35 की तैनाती से न केवल देश के मुख्य भूमि की सुरक्षा अभेद्य होगी, बल्कि फारस की खाड़ी और होर्मुज की जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों पर भी तेहरान की पकड़ और अधिक मजबूत हो जाएगी। इन जेट्स को ईरान की राजधानी तेहरान और प्रमुख परमाणु प्रतिष्ठानों के पास स्थित अति-सुरक्षित भूमिगत एयरबेस (Underground Airbases) में तैनात किए जाने की संभावना है, जहां से ये केवल कुछ ही मिनटों के भीतर टेक-ऑफ करके किसी भी हवाई खतरे का काम तमाम कर सकते हैं।
निष्कर्ष के तौर पर देखें तो, रूस से Su-35 लड़ाकू विमानों का मिलना केवल हथियारों की खरीद-बिक्री का मामला नहीं है, बल्कि यह वैश्विक भू-राजनीति में हो रहे बड़े बदलाव का एक बहुत बड़ा प्रतीक है। अमेरिकी वर्चस्व को सीधी चुनौती देते हुए ईरान ने अपनी हवाई शक्ति का ऐसा कायाकल्प किया है जो आने वाले समय में मध्य पूर्व में किसी भी संभावित महायुद्ध के नतीजों को बदलने की ताकत रखता है। अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों के लिए यह एक बड़ा झटका है, जिसने उन्हें अपनी भावी रणनीतियों पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।