अब खुद उनका देश बटने जा रहा है चार हिस्सों में! आज लिखी जाएगी ब्रिटेन के टूटने की फाइनल स्क्रिप्ट

अब खुद उनका देश बटने जा रहा है चार हिस्सों में! आज लिखी जाएगी ब्रिटेन के टूटने की फाइनल स्क्रिप्ट

इतिहास के पन्नों को पलटकर देखा जाए तो ब्रिटिश साम्राज्य ने दुनिया भर के कई देशों की सीमाओं को अपनी सुविधानुसार काटा और बांटा है, जिसमें भारत का विभाजन इसका सबसे बड़ा और दर्दनाक उदाहरण है। जिस साम्राज्य ने कभी पूरी दुनिया पर हुकूमत की थी और दूसरे देशों को भौगोलिक रूप से टुकड़ों में विभाजित करने का कुचक्र रचा था, आज वही ब्रिटिश साम्राज्य खुद अपने ही देश के अंदरूनी राजनीतिक और सामाजिक हालातों के चलते अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से जूझ रहा है। यूके यानी यूनाइटेड किंगडम, जो कभी स्कॉटलैंड, वेल्स, इंग्लैंड और उत्तरी आयरलैंड को मिलाकर एक अखंड ताकतवर देश बना था, आज अंदरूनी असंतोष, राजनीतिक दूरियों और ऐतिहासिक समझौतों की दरारों के कारण चार अलग-अलग हिस्सों में टूटने की कगार पर आ खड़ा हुआ है। आज का दिन वैश्विक राजनीति और ब्रिटेन के आंतरिक इतिहास में एक बहुत बड़ा मोड़ साबित होने जा रहा है, क्योंकि आज इस संभावित महा-विभाजन या टूट की फाइनल 'स्क्रिप्ट' लिखे जाने की पूरी तैयारी हो चुकी है, जिसने ब्रिटिश हुकूमत और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषकों की नींद उड़ा दी है।

साम्राज्यवादी सोच का अंत और यूके के भीतर बढ़ती क्षेत्रीय दूरियां

कभी 'वह साम्राज्य जिस पर कभी सूरज नहीं अस्त होता' का दावा करने वाला ब्रिटेन आज अपनी ही बनाई नीतियों के चक्रव्यूह में फंसता नजर आ रहा है। इतिहास गवाह है कि ब्रिटिश हुकूमत ने भारत और पाकिस्तान समेत दुनिया के कई हिस्सों में मजहबी और भौगोलिक लकीरें खींचकर मुल्कों को तोड़ा था, लेकिन वक्त का पहिया ऐसा घूमा है कि अब खुद उनके अपने ही देश के भीतर से अलगाव और स्वतंत्रता के सुर तेजी से गूंजने लगे हैं। यूनाइटेड किंगडम जिसे मुख्य रूप से चार देशों यानी इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड का एक राजनीतिक संघ कहा जाता है, उसके भीतर पिछले कुछ वर्षों में वैचारिक और सांस्कृतिक दूरियां बहुत अधिक बढ़ चुकी हैं। आज की तारीख में इन चारों क्षेत्रों के राजनीतिक दल और आम नागरिक अपनी स्वतंत्र पहचान को बनाए रखने के लिए लंदन की केंद्रीय सत्ता से पूरी तरह बगावत करने के मूड में नजर आ रहे हैं, जिससे इस ऐतिहासिक संघ के टूटने की जमीन तैयार हो चुकी है।

स्कॉटलैंड की आजादी की मांग और जनमत संग्रह का बढ़ता दबाव

ब्रिटेन के इस संभावित विभाजन की पटकथा में सबसे बड़ा और मजबूत किरदार स्कॉटलैंड अदा कर रहा है। स्कॉटलैंड के भीतर लंबे समय से ब्रिटेन से अलग होकर एक स्वतंत्र और संप्रभु देश बनने की मांग की जा रही है। वहां की जनता और क्षेत्रीय राजनीतिक नेतृत्व का यह स्पष्ट मानना है कि लंदन में बैठी ब्रिटिश संसद उनकी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करने में पूरी तरह विफल रही है। ब्रेक्जिट (Brexit) के फैसले के दौरान भी स्कॉटलैंड के बहुसंख्यक लोगों ने यूरोपीय यूनियन में बने रहने के पक्ष में मतदान किया था, लेकिन इंग्लैंड के दबाव के कारण उन्हें जबरन यूरोपीय संघ से बाहर होना पड़ा, जिसने आग में घी डालने का काम किया। आज स्कॉटिश नेशनल पार्टी और अन्य स्वतंत्रता समर्थक ताकतें एक बार फिर से नए जनमत संग्रह की मांग को लेकर अपनी रणनीति को अंतिम रूप दे रही हैं, जिससे यूके की नींव हिलती हुई दिखाई दे रही है।

उत्तरी आयरलैंड की बदलती राजनीतिक डेमोग्राफी और आयरिश पुनर्मिलन

यूनाइटेड किंगडम के टूटने की इस स्क्रिप्ट का दूसरा सबसे संवेदनशील और विस्फोटक अध्याय उत्तरी आयरलैंड से जुड़ा हुआ है। उत्तरी आयरलैंड का इतिहास संघर्ष, हिंसा और धार्मिक-राजनीतिक तनावों से भरा रहा है। ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने के बाद उत्तरी आयरलैंड की व्यापारिक और भौगोलिक सीमाएं ऐसी स्थिति में आ गई हैं जहाँ उसका झुकाव धीरे-धीरे अपने पड़ोसी देश रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड की तरफ ज्यादा बढ़ने लगा है। वहाँ की स्थानीय राजनीति में 'शिन फेन' जैसे दलों का मजबूत होना और उत्तरी आयरलैंड की जनसांख्यिकी (Demographics) में आए बदलाव इस बात का स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि आने वाले समय में उत्तरी आयरलैंड ब्रिटेन से नाता तोड़कर आयरलैंड गणराज्य के साथ विलय का रास्ता चुन सकता है। यह घटनाक्रम ब्रिटिश क्राउन और लंदन की सरकार के लिए किसी बहुत बड़े झटके से कम नहीं है, क्योंकि यह सीधे तौर पर देश की भौगोलिक अखंडता पर करारा प्रहार है।

वेल्स और इंग्लैंड के बीच बढ़ती खाई और आर्थिक संकट का प्रभाव

इस महा-विभाजन की श्रृंखला में वेल्स की स्थिति भी काफी दिलचस्प और महत्वपूर्ण बनती जा रही है। हालांकि पारंपरिक रूप से वेल्स को इंग्लैंड के सबसे करीब माना जाता रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में वेल्स के भीतर भी अपनी सांस्कृतिक अस्मिता, भाषा और आर्थिक आत्मनिर्भरता को लेकर एक नई चेतना जागृत हुई है। ब्रिटेन की चरमराती अर्थव्यवस्था, लगातार बढ़ती महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और जीवन स्तर में आई गिरावट ने वेल्स के युवाओं और आम नागरिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या लंदन के नियंत्रण में रहना उनके भविष्य के लिए सुरक्षित है या नहीं। इंग्लैंड की नीतियां और वहां की राजनीतिक उठापटक जब पूरे संघ पर थोपी जाती है, तो बाकी के तीनों देश खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं। यही वजह है कि आज ब्रिटेन के भीतर हर मोर्चे पर असंतोष की आग सुलग रही है और क्षेत्रीय दल अपनी अलग राह तलाशने के लिए पूरी तरह एकजुट हो चुके हैं।

आज लिखे जाने वाले नए इतिहास के वैश्विक मायने और भविष्य की दिशा

आज का दिन ब्रिटेन के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से एक टर्निंग पॉइंट साबित होने वाला है, क्योंकि आज देश के भीतर भविष्य की दिशा तय करने वाले कई महत्वपूर्ण वैधानिक और राजनीतिक दस्तावेज या प्रस्ताव पेश किए जाने की संभावना है। जिन राजनीतिक मंचों और संसदों में कभी पूरी दुनिया को गुलाम बनाने की साजिशें रची जाती थीं, आज वहां के नेता अपने ही देश को एक सूत्र में बांधे रखने के लिए संघर्ष करते नजर आ रहे हैं। यदि आने वाले समय में यह स्क्रिप्ट पूरी तरह लागू होती है, तो नक्शे पर मौजूद 'यूनाइटेड किंगडम' का यह नाम इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा और ब्रिटेन सिमटकर केवल इंग्लैंड तक सीमित रह सकता है। यह घटना पूरी दुनिया को यह संदेश देती है कि इतिहास अपने चक्र को कैसे पूरा करता है और जो देश दूसरों के घरों में दीवारें खींचते हैं, एक दिन उनके अपने ही घरों में भी दीवारें खड़ी हो जाती हैं।

मुख्य बिंदु: कभी दुनिया के कई देशों को विभाजित करने वाला ब्रिटेन आज खुद चार हिस्सों (इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड) में टूटने की कगार पर पहुंच गया है। स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड में बढ़ते अलगाववादी रुझानों के बीच आज इस ऐतिहासिक टूट की फाइनल स्क्रिप्ट लिखे जाने की पूरी तैयारी हो चुकी है।