अपनी ही पार्टी के निशाने पर आए ट्रंप: ईरान से जिस डील को बताया था 'मास्टरस्ट्रोक', अब उसी पर घिरे

अपनी ही पार्टी के निशाने पर आए ट्रंप: ईरान से जिस डील को बताया था 'मास्टरस्ट्रोक', अब उसी पर घिरे

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तीन व्यावसायिक जहाजों पर हुए हमलों ने एक बार फिर पश्चिम एशिया का तनाव बढ़ा दिया। अमेरिका का दावा है कि इसके जवाब में उसने ईरान के 80 से अधिक सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमले किए। 

कुछ समय पहले डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ हुए युद्धविराम और समझौते को अपनी बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि बताया था। मगर कुछ ही दिनों में यही समझौता उनके लिए राजनीतिक चुनौती बन गया। उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के कई नेताओं ने सवाल उठाए कि अमेरिका ने ईरान को इतनी रियायतें देने की जरूरत क्यों महसूस की।

रिपब्लिकन नेताओं ने क्या आपत्ति जताई

समझौते के तहत अमेरिका ने होर्मुज क्षेत्र में नौसैनिक नाकेबंदी हटाई और ईरानी तेल पर अस्थायी राहत देने का फैसला किया। इसके बदले ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को सामान्य रूप से खुला रखने का भरोसा दिया।

हालांकि आलोचकों का कहना था कि इस समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल क्षमता और उसके प्रॉक्सी नेटवर्क को लेकर कोई ठोस प्रतिबद्धता शामिल नहीं थी। इसी वजह से रिपब्लिकन पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने इस डील पर खुलकर सवाल उठाए।

टॉम कॉटन, रोजर विकर, बिल कैसिडी, जॉन कॉर्निन और टेड क्रूज जैसे नेताओं ने अलग-अलग तरीके से समझौते की आलोचना की। कुछ ने इसे कमजोर बातचीत का नतीजा बताया वहीं कुछ ने इसे अमेरिकी विदेश नीति की बड़ी गलती करार दिया। कई नेताओं का मानना था कि ईरान को बिना बड़ी शर्तें माने ही महत्वपूर्ण राहत मिल गई।

जहाजों पर हमले के बाद बदली राजनीतिक तस्वीर

6 और 7 जुलाई को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तीन कमर्शियल जहाजों पर हुए हमलों ने पूरे घटनाक्रम की दिशा बदल दी। इसके बाद अमेरिका ने बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई का दावा किया। इस कदम ने ट्रंप को केवल सुरक्षा के मोर्चे पर जवाब देने का अवसर नहीं दिया बल्कि घरेलू राजनीति में भी अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका दिया।

विश्लेषकों की नजर में यदि ट्रंप केवल बातचीत और कूटनीति पर टिके रहते तो विपक्ष के साथ-साथ उनकी अपनी पार्टी के नेता भी उन्हें ईरान के प्रति नरम रुख अपनाने वाला राष्ट्रपति बताते। मगर व्यापक सैन्य कार्रवाई के जरिए उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि अमेरिका समझौते का समर्थन कर सकता है। हालांकि किसी भी चुनौती का जवाब ताकत के साथ देने से पीछे नहीं हटेगा।

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