चीन-पाक सीमा आयोग की बैठक के पीछे ड्रैगन की कौन सी नई और खतरनाक चाल
अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक और सामरिक गलियारों में इन दिनों एक बार फिर सरगर्मी तेज हो गई है, जहां भारत के दो पारंपरिक और क्षेत्रीय विरोधी यानी चीन और पाकिस्तान के बीच चल रहे अंदरूनी खेल ने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है। हाल ही में चीन और पाकिस्तान के बीच सीमा आयोग की एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें बीजिंग की तरफ से '3 M' यानी मिलिट्री, मार्केट्स और मैनिपुलेशन (Military, Markets and Manipulation) का एक नया और आकर्षक फॉर्मूला पेश किया गया था। इस बैठक के दौरान ड्रैगन ने इस्लामाबाद को बड़े-बड़े आर्थिक और सैन्य सहयोग के सुनहरे सपने दिखाए थे और आपसी सहयोग के नए आयाम गढ़ने की कसमें खाई थीं। लेकिन कूटनीति के जानकारों का कहना है कि चीन की कथनी और करनी में हमेशा जमीन-आसमान का अंतर रहा है, और ठीक इसके तीन दिन बाद ही बीजिंग की तरफ से कुछ ऐसे चौंकाने वाले कदम उठाए गए या ऐसी नीतियां सामने आईं जिन्हें पाकिस्तान के लिए एक बड़े धोखे के रूप में देखा जा रहा है। इस पूरी घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि ड्रैगन किसी भी देश का सच्चा दोस्त नहीं हो सकता और वह केवल अपने स्वार्थ के लिए पड़ोसी देशों का इस्तेमाल करता है।
क्या है चीन का वह रहस्यमयी '3 M' फॉर्मूला जिसके जाल में फंसा पाकिस्तान?
जब भी बीजिंग और इस्लामाबाद के बीच उच्च स्तर की बैठकें होती हैं, तो चीन हमेशा कूटनीतिक शब्दावली के नए जाल बुनता है ताकि पाकिस्तान को मानसिक और आर्थिक रूप से पूरी तरह अपने शिकंजे में कसा जा सके। इस बार की सीमा आयोग की बैठक में चीन ने '3 M' के जिस फॉर्मूले की बात की थी, उसका मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान की जर्जर अर्थव्यवस्था और कमजोर होती सैन्य व्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेना था। इस फॉर्मूले के तहत पहला 'M' मिलिट्री कोऑपरेशन यानी संयुक्त सैन्य आधुनिकीकरण और खुफिया साझाकरण को बढ़ाना था, ताकि भारत के खिलाफ मोर्चेबंदी को और मजबूत किया जा सके। दूसरा 'M' मार्केट्स और चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) के विस्तार से जुड़ा था, जिसमें पाकिस्तान के बाजारों और संसाधनों पर चीनी कंपनियों का एकाधिकार स्थापित करने की बात थी। वहीं, तीसरा 'M' मैनिपुलेशन या रणनीतिक हेरफेर था, जिसके जरिए बीजिंग ने पाकिस्तान की विदेश नीति और आंतरिक प्राथमिकताओं पर परोक्ष रूप से अपनी पकड़ और अधिक मजबूत करने की चाल चली। पाकिस्तान के हुक्मखानों ने इस फॉर्मूले को अपनी बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत मान लिया, लेकिन उन्हें इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह किसी सुनहरे पिंजरे की शुरुआत है।
बैठक के ठीक तीन दिन बाद ड्रैगन के बदले तेवर और सामने आया असली चेहरा
ऐतिहासिक रूप से यह देखा गया है कि चीन अपने समझौतों और वादों पर लंबे समय तक टिकने के लिए नहीं जाना जाता है, और इस बार भी सीमा आयोग की बैठक के महज तीन दिन के भीतर ही उसका अवसरवादी चरित्र खुलकर सामने आ गया। जिन वादों और समझौतों के आधार पर पाकिस्तान के अधिकारियों ने बीजिंग में जश्न मनाया था, उन्हें जमीन पर उतारने के मामले में चीनी प्रशासन ने अचानक पीछे हटना शुरू कर दिया। आर्थिक पैकेज और निवेश की जिन बड़ी-बड़ी रकमों का ढिंढोरा पीटा गया था, उनके वितरण के लिए ऐसे कड़े और जटिल नियम थोप दिए गए जिन्हें पूरा करना पाकिस्तान के बस में नहीं था। इसके अलावा, सीमा सुरक्षा और रणनीतिक मोर्चे पर भी चीन ने पाकिस्तान को अपने ही हाल पर छोड़ते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखना शुरू कर दिया। सुरक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि '3 M' का यह पूरा नैरेटिव असल में पाकिस्तान की रणनीतिक मजबूरियों का फायदा उठाने और उसे कर्ज के ऐसे दलदल में धकेलने की एक सोची-समझती चाल थी, जहां से निकलना इस्लामाबाद के लिए नामुमकिन हो जाए।
भारत विरोधी गठजोड़ की हकीकत और क्षेत्रीय सुरक्षा पर इसका दूरगामी असर
भारत के खिलाफ अपनी कुटिल चालें चलने के लिए चीन हमेशा से पाकिस्तान का इस्तेमाल एक मोहरे के रूप में करता आया है, और यह सीमा आयोग की बैठक भी इसी भू-राजनीतिक रणनीति का एक हिस्सा थी। भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थिति को लेकर चल रहे तनाव के बीच बीजिंग यह चाहता है कि पाकिस्तान पश्चिमी और उत्तरी मोर्चों पर लगातार अशांति बनाए रखे ताकि भारतीय सुरक्षा बलों का ध्यान बंटा रहे। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान को यह समझ नहीं आ रहा है कि चीन की इस स्वार्थी कूटनीति के कारण उसका खुद का वजूद दांव पर लगता जा रहा है। चीन के कारण पाकिस्तान में आंतरिक अशांति, आर्थिक दिवालियापन और बलूचिस्तान जैसे क्षेत्रों में चीनी नागरिकों के खिलाफ आक्रोश लगातार बढ़ रहा है। जब बीजिंग अपने वादों से मुकर जाता है और इस्लामाबाद को अकेला छोड़ देता है, तब पाकिस्तान की कमजोर और दिशाहीन नीतियां पूरी तरह बेनकाब हो जाती हैं। क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से यह स्थिति दक्षिण एशिया में एक नए अस्थिर दौर की ओर इशारा करती है, जहां ड्रैगन अपनी विस्तारवादी नीतियों के तहत छोटे पड़ोसियों को कर्ज के जाल में फंसाकर गुलाम बनाने की नीयत रखता है।