यूक्रेन से लेकर मिडिल ईस्ट तक जारी है भयंकर तबाही, जानिए अब दुनिया के पास क्या है आखिरी रास्ता

यूक्रेन से लेकर मिडिल ईस्ट तक जारी है भयंकर तबाही, जानिए अब दुनिया के पास क्या है आखिरी रास्ता

वर्तमान समय में जब पूरी दुनिया एक के बाद एक भीषण युद्धों, भू-राजनीतिक संघर्षों और मानवता को झकझोर देने वाली त्रासदियों के दौर से गुजर रही है, तब अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा स्थापित करने के लिए बनाई गई सबसे बड़ी संस्था यानी संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) की भूमिका और उसकी लाचारी पर दुनिया भर में सबसे बड़े सवाल खड़े होने लगे हैं। एक तरफ जहां यूक्रेन के मैदानों में गोलाबारी से शहर खंडहर में तब्दील हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ मिडिल ईस्ट (Middle East) यानी पश्चिम एशिया में बारूद का ऐसा धधक रहा समंदर है जो किसी भी पल पूरी दुनिया को अपनी आगोश में ले सकता है। इन तमाम भयानक संघर्षों को रोकने और पीड़ित मानवता को बचाने में संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह बेबस नजर आ रहा है, जिसके पीछे सबसे बड़ा कारण यूएन सिक्योरिटी काउंसिल के पांच स्थायी सदस्यों यानी पी-5 (P-5) देशों के पास मौजूद 'वीटो पावर' (Veto Power) की ताकत है। इस विशेष भू-राजनीतिक रिपोर्ट में हम गहराई से विश्लेषण करेंगे कि कैसे इन पांच महाशक्तियों की आपसी खींचतान और वीटो के हथियारों ने वैश्विक शांति के हाथों को बांध दिया है और क्या वाकई इस संकट से बाहर निकलने का अब कोई आखिरी रास्ता बचा है या नहीं।

संयुक्त राष्ट्र और पी-5 देशों की वीटो पावर का इतिहास: कैसे पांच महाशक्तियों के हाथ में सिमट गई दुनिया की तकदीर

द्वितीय विश्व युद्ध के भीषण नरसंहार के बाद साल 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई थी, तब इसका मुख्य उद्देश्य यही था कि दुनिया को भविष्य में कभी किसी तीसरे विश्व युद्ध का सामना न करना पड़े और अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान बातचीत के जरिए निकाला जा सके। इस महासंस्था के भीतर निर्णय लेने की सबसे बड़ी ताकत सुरक्षा परिषद (UNSC) को सौंपी गई, जिसमें पांच देशों—अमेरिका, रूस, चीन, यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस—को स्थायी सदस्य (Permanent Members) के रूप में शामिल किया गया और इन सभी को 'वीटो पावर' यानी किसी भी प्रस्ताव को अकेले दम पर खारिज कर देने का असीमित अधिकार दे दिया गया। उस दौर की भू-राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार यह व्यवस्था बनाई गई थी ताकि बड़ी महाशक्तियां संस्था से बाहर न जाएं, लेकिन आज 21वीं सदी के इस दौर में यही वीटो पावर वैश्विक शांति के मार्ग में सबसे बड़ा और नासूर बनता जा रहा है। जब भी दुनिया के किसी कोने में कोई देश आक्रामकता दिखाता है या मानवाधिकारों का हनन करता है, तो इनमें से कोई न कोई महाशक्ति अपने भू-राजनीतिक हितों और रणनीतिक साझीदार को बचाने के लिए वीटो का इस्तेमाल करके हर शांति प्रस्ताव को कचरे के डिब्बे में डाल देती है।

यूक्रेन संकट से लेकर मिडिल ईस्ट के सुलगते रण तक: हर मोर्चे पर लाचार क्यों साबित हो रहा है यूएन?

आज यूक्रेन के युद्ध को लंबा वक्त बीत चुका है, जहां लाखों लोग बेघर हो चुके हैं और अरबों-खरबों की संपत्ति का नुकसान हो चुका है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद रूस के खिलाफ कोई भी कड़ा और बाध्यकारी प्रस्ताव पारित करने में पूरी तरह असमर्थ रही है क्योंकि रूस खुद पी-5 का सदस्य होने के नाते वहां वीटो का इस्तेमाल कर देता है। ठीक इसी प्रकार, मिडिल ईस्ट में गाजा से लेकर लेबनान, ईरान और इजराइल के बीच चल रहे महासंग्राम में जब भी संघर्ष विराम (Ceasefire) या मानवीय सहायता पहुंचाने का कोई प्रस्ताव आता है, तो अमेरिका या अन्य पश्चिमी देश अपने वीटो अधिकारों के जरिए उसे रोक देते हैं। दुनिया भर के आम नागरिक और निर्दोष बच्चे इन युद्धों में अपनी जानें गंवा रहे हैं, अस्पताल और स्कूल मलबे के ढेर में बदल रहे हैं, और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव केवल बयान जारी करने या चिंता जताने के अलावा जमीन पर कुछ भी प्रभावी करने की स्थिति में नहीं हैं। इस भयंकर लाचारी ने यह साबित कर दिया है कि मौजूदा वैश्विक ढांचा केवल ताकतवर देशों के हितों की रक्षा करने का जरिया बनकर रह गया है और आम इंसान की जिंदगी की वहां कोई कीमत नहीं बची है।

क्या संयुक्त राष्ट्र में सुधार या सुरक्षा परिषद का विस्तार ही है इस भयानक संकट का एकमात्र समाधान?

अंतरराष्ट्रीय मामलों के दिग्गज जानकारों और दुनिया के कई विकासशील देशों—जैसे भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान—लंबे समय से यह मांग उठाते रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में तत्काल व्यापक सुधार किए जाने चाहिए। पी-5 देशों की यह पुरानी और एकाधिकार वाली व्यवस्था अब आज की बहुध्रुवीय (Multipolor) दुनिया की सच्चाइयों से कोसों दूर हो चुकी है, जहां भारत जैसी उभरती हुई महाशक्तियां और ग्लोबल साउथ की आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की संख्या नहीं बढ़ाई गई और वीटो पावर के इस्तेमाल पर कुछ नैतिक या कानूनी अंकुश नहीं लगाए गए, तो लीग ऑफ नेशंस की तरह संयुक्त राष्ट्र का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। सुधारों का यह मुद्दा अब केवल कूटनीतिक चर्चाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस ग्रह पर मानवता के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए एक अनिवार्य शर्त बन चुका है, क्योंकि जब तक वैश्विक संस्थाएं निष्पक्ष और शक्तिशाली नहीं होंगी, तब तक दुनिया को युद्धों के साये से मुक्त नहीं कराया जा सकता।

दुनिया के सामने अब क्या है आखिरी रास्ता? क्या मानवता खुद अपने भाग्य का फैसला करेगी?

जैसे-जैसे वैश्विक तनाव अपने चरम पर पहुंच रहा है और परमाणु युद्ध की आशंकाएं मंडरा रही हैं, यह सवाल हर बुद्धिजीवी के मन में सुलग रहा है कि आखिर इस संकट से उबरने का आखिरी रास्ता क्या बचा है। जब संयुक्त राष्ट्र और उसकी संस्थाएं विफल हो जाती हैं, तब दुनिया को क्षेत्रीय संगठनों, द्विपक्षीय समझौतों और जनता के वैश्विक दबाव पर निर्भर रहना पड़ता है। नागरिक समाज, मानवाधिकार संगठन और शांतिप्रिय देशों का यह साझा नैतिक दबाव ही वह अंतिम उम्मीद है जो महाशक्तियों को अपनी बेलगाम महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाने के लिए मजबूर कर सकती है। इसके साथ ही, वैकल्पिक कूटनीतिक मंचों का निर्माण करना होगा जो वीटो की बाधाओं से मुक्त होकर सीधे मानवता और न्याय के पक्ष में खड़े हो सकें। यदि समय रहते इन गहरी संरचनात्मक त्रुटियों को नहीं सुधारा गया, तो इतिहास इस बात का गवाह रहेगा कि कैसे पांच देशों के अहंकार और अधिकारों ने इस खूबसूरत दुनिया को तबाही के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया था।