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Up kiran,Digital Desk : पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ों से निकलकर 250 लोगों का एक जत्था गुरुवार को इजरायल की धरती पर उतरा। यह कोई सामान्य यात्रा नहीं, बल्कि एक ऐसी 'घर वापसी' है जिसका इंतजार पिछले 2700 सालों से किया जा रहा था। मणिपुर और मिजोरम में रहने वाले 'बीने मनेशे' (Bnei Menashe) समुदाय के इन लोगों को इजरायल सरकार ने अपना वंशज मानते हुए वापस बुलाना शुरू कर दिया है।

कौन हैं बीने मनेशे? 2700 साल पुराना है इतिहास

बीने मनेशे समुदाय मुख्य रूप से भारत के मणिपुर और मिजोरम राज्यों में निवास करता है। इस समुदाय का दावा है कि वे बाइबिल में वर्णित 'मनेशे कबीले' के वंशज हैं। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि करीब 2,700 साल पहले इजरायल से 10 कबीलों को निर्वासित कर दिया गया था, जिनमें से मनेशे कबीला भी एक था।

मान्यता है कि ये लोग सदियों तक फारस, अफगानिस्तान, तिब्बत और चीन के रास्ते पलायन करते हुए भारत के पूर्वोत्तर हिस्से में बस गए थे। हैरानी की बात यह है कि हजारों सालों तक अलग रहने के बावजूद इस समुदाय ने यहूदी धर्म की कुछ प्राचीन परंपराओं, जैसे खतना और विशेष धार्मिक रीति-रिवाजों को जीवित रखा।

'ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन' और करोड़ों का बजट

इजरायल सरकार ने भारत में रह रहे इन यहूदियों को वापस लाने के लिए "ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन" (Operation Wings of Dawn) शुरू किया है। इस अभियान के तहत:

वर्ष 2026 के अंत तक 1,200 और लोगों को इजरायल लाने का लक्ष्य है।

अगले दो हफ्तों में दो विशेष उड़ानें और संचालित की जाएंगी।

इजरायल के अलिया और इंटीग्रेशन मंत्रालय ने इस पूरी पुनर्वास योजना के लिए 9 करोड़ शेकेल (लगभग 3 करोड़ अमेरिकी डॉलर) का भारी-भरकम बजट आवंटित किया है।

धर्मांतरण की प्रक्रिया क्यों है जरूरी?

इजरायल पहुंचने के बाद इन लोगों को एक विशेष धार्मिक प्रक्रिया यानी धर्मांतरण (Conversion) से गुजरना होगा। इसके पीछे का कारण काफी दिलचस्प है। यहूदी एजेंसियों का कहना है कि सदियों के प्रवास के दौरान भारत में कई मिशनरियों ने इस समुदाय के लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया था। अब इजरायल का पूर्ण नागरिक बनने और आधिकारिक रूप से 'यहूदी' कहलाने के लिए उन्हें फिर से यहूदी धर्म की दीक्षा लेनी होगी।

जब रब्बी ने दी मान्यता, खुला आव्रजन का रास्ता

बीने मनेशे के यहूदी होने पर लंबे समय तक विवाद रहा, लेकिन 2005 में एक बड़ा मोड़ आया। सेफारदी समुदाय के मुख्य रब्बी श्लोमो अमर ने आधिकारिक तौर पर उन्हें "इजरायल के वंशज" के रूप में मान्यता दे दी। इस फैसले ने उनके लिए इजरायल के दरवाजे खोल दिए। पिछले तीन दशकों में लगभग 4,000 सदस्य पहले ही इजरायल जा चुके हैं, जबकि 6,000 अन्य अभी भी भारत में अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

इजरायल का गठन ही दुनिया भर में बिखरे हुए यहूदियों को एक छत के नीचे लाने के लिए हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिटलर के अत्याचारों के बाद से ही इजरायल अपनी पुनर्वास योजनाओं के जरिए अपने 'खोए हुए कबीलों' को एकजुट करने में जुटा है।