Up Kiran, Digital Desk: आज जब भारत स्वतंत्रता के 75 से अधिक वर्ष मना रहा है हम एक ऐसे नायक को याद कर रहे हैं जिनके सपने आज भी हमारी सामूहिक चेतना में गूंजते हैं - धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा। 15 नवंबर 1875 को रांची के पास खूंटी के उलिहातू गांव में जन्मे इस महान आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक ने महज 25 साल की उम्र में अपनी जीवन यात्रा समाप्त कर ली (9 जून 1900 को रांची सेंट्रल जेल में निधन)। मगर उनका 'उलगुलान' (महान हलचल) और आदिवासी समुदाय के लिए स्वतंत्रता सम्मान और समानता के उनके सपने आज भी आदिवासी आंदोलनों को प्रेरित करते हैं। दुखद है कि औपनिवेशिक शासन और आधुनिक विकास मॉडल ने उनके कई सपनों को साकार नहीं होने दिया। आज की पीढ़ी के लिए यह समझना जरूरी है कि बिरसा मुंडा के वे कौन से सपने थे जो आज भी अधूरे हैं और उन्हें पूरा करने की दिशा में पहल करना क्यों आवश्यक है।
बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों के खिलाफ 'उलगुलान' किया था जिसका मुख्य उद्देश्य आदिवासी समुदाय का स्वशासन स्थापित करना उनकी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करना और सामाजिक-आर्थिक समानता सुनिश्चित करना था। आइए उनके उन अधूरे सपनों पर एक नज़र डालते हैं:
1. आदिवासियों को मिले स्वशासन: 'अबुआ दिशोम अबुआ राज' का अधूरा नारा
बिरसा मुंडा का सबसे बड़ा सपना था कि आदिवासी समुदाय का अपनी जमीन जंगल और संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण हो। उन्होंने 'अबुआ दिशोम अबुआ राज' (हमारा देश हमारा शासन) का शक्तिशाली नारा दिया था। यह नारा आज भी गूंजता है मगर दुर्भाग्यवश यह सपना आज भी अधूरा है। आदिवासी क्षेत्रों के संसाधनों का बड़े पैमाने पर दोहन हुआ है जिससे आदिवासियों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ है। अपनी जमीन और अधिकारों के लिए उन्हें आज भी लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है और पूर्ण स्वशासन का सपना अभी भी दूर की कौड़ी है।
2. आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान की रक्षा
बिरसा मुंडा ने आदिवासियों को धर्मांतरण से बचाने और उनकी मूल पहचान बनाए रखने के लिए 'बिरसाइत' नामक एक अलग धर्म की स्थापना की थी जो आदिवासी अध्यात्म पर आधारित था। शुरुआत में 'बिरसाइत धर्म' का व्यापक रूप से पालन किया गया मगर समय के साथ आदिवासी संस्कृति पर बाहरी प्रभावों का दबदबा बढ़ता गया। कई आदिवासी समुदाय अपनी समृद्ध भाषा परंपरा और रीति-रिवाजों से दूर होते जा रहे हैं जिससे उनकी अनूठी सांस्कृतिक पहचान खतरे में पड़ गई है।
3. आदिवासियों को सामाजिक और आर्थिक समानता: गरीबी और अभाव का चक्र
भारत के औपनिवेशिक काल में बिरसा मुंडा ने जमींदारों और साहूकारों के शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाई थी जो आदिवासियों को उनकी ज़मीन से बेदखल कर रहे थे। उनका सपना था कि आदिवासी समुदाय आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बने और शोषण मुक्त जीवन जी सके। हालांकि स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी आदिवासी क्षेत्रों में गरीबी शिक्षा की कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव एक गंभीर समस्या बनी हुई है। आर्थिक आत्मनिर्भरता का सपना अभी भी अधूरा है।
4. जंगल और पर्यावरण का संरक्षण: खतरे में 'जीवन का आधार'
बिरसा मुंडा का मानना था कि जंगल आदिवासियों के जीवन का आधार हैं और उनका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। उनके समय में ब्रिटिश शासन ने जंगलों को नष्ट करना शुरू कर दिया था। दुखद है कि आज भी अवैध कटाई और अंधाधुंध विकास परियोजनाओं के कारण आदिवासी क्षेत्रों के जंगल खतरे में हैं जिससे न केवल पर्यावरण को नुकसान हो रहा है बल्कि आदिवासी समुदायों की आजीविका भी प्रभावित हो रही है।
5. आदिवासियों का राजनीतिक सशक्तिकरण: सीमित प्रतिनिधित्व की चुनौती
भगवान बिरसा मुंडा चाहते थे कि आदिवासी समुदाय के लोग राजनीतिक रूप से सशक्त हों और अपनी आवाज़ प्रभावी ढंग से उठा सकें। झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्यों के गठन के बाद कुछ आदिवासी नेतृत्व सामने आया है मगर मुख्यधारा की राजनीति में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी सीमित है और उनकी आवाज़ अक्सर दब जाती है। पूर्ण राजनीतिक सशक्तिकरण का सपना अभी भी साकार नहीं हो पाया है।
_885797785_100x75.png)
_200989062_100x75.png)
_751129111_100x75.png)
_496936641_100x75.png)
_1277463329_100x75.png)