Up Kiran, Digital Desk: खूब पढ़ाई करो, अच्छी नौकरी पकड़ो, 40 साल तक जमकर काम करो और फिर 60 की उम्र में आराम से रिटायर हो जाओ।" - यह वो सलाह है जो शायद हम सबने अपने बड़ों से सुनी है। सालों तक इसी फॉर्मूले पर दुनिया चलती आई। लेकिन अब, नई पीढ़ी यानी जेन-जी (Gen-Z) इस पुरानी सोच को पूरी तरह से बदलने पर तुली है। उनका एक नया ट्रेंड है, जिसके बारे में सुनकर शायद पुरानी पीढ़ी को थोड़ा अजीब लगे - इसका नाम है 'माइक्रो-रिटायरमेंट'।
तो आखिर ये 'माइक्रो-रिटायरमेंट' है क्या? क्या ये युवा सच में जवानी में ही काम छोड़ रहे हैं? चलिए, इसे आसान भाषा में समझते हैं।
क्या है माइक्रो-रिटायरमेंट?
माइक्रो-रिटायरमेंट का मतलब परमानेंट रिटायरमेंट नहीं है। इसका मतलब है कि आप अपने लंबे करियर के बीच में छोटे-छोटे, सोच-समझकर ब्रेक लेते हैं। यह ब्रेक कुछ हफ्तों से लेकर कुछ महीनों तक का हो सकता है। यह सिर्फ छुट्टियां मनाने जैसा नहीं है। इसका मकसद है खुद को रिचार्ज करना, बर्नआउट (काम के बोझ से होने वाली थकान) से बचना और उन चीजों को करना जिनके लिए आप हमेशा सोचते रहते हैं कि 'रिटायरमेंट के बाद करूंगा'।
जैसे, कोई नई स्किल सीखना, किसी अनजानी जगह पर जाकर कुछ महीने रहना, कोई किताब लिखना या बस कुछ न करके अपने मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना।
क्यों अपना रही है नई पीढ़ी यह ट्रेंड?
अब सवाल यह उठता है कि जिस उम्र में लोग करियर बनाने के लिए पागलों की तरह मेहनत करते हैं, उस उम्र में यह पीढ़ी ब्रेक लेने की बात क्यों कर रही है? इसके पीछे कुछ बहुत गहरे और दिलचस्प कारण हैं:
बर्नआउट का बढ़ता खतरा: आज के दौर में काम का दबाव और हमेशा ऑनलाइन रहने की उम्मीद युवाओं को बहुत जल्दी थका रही है। 'माइक्रो-रिटायरमेंट' इस मानसिक और शारीरिक थकान से उबरने का एक तरीका है।
अनुभवों को अहमियत देना: जेन-जी पैसे जमा करने से ज्यादा अनुभवों को इकट्ठा करने में यकीन रखती है। वे दुनिया घूमना चाहते हैं, नई चीजें आजमाना चाहते हैं और इसके लिए 60 साल की उम्र तक इंतजार नहीं करना चाहते।
मानसिक शांति सबसे ऊपर: इस पीढ़ी के लिए मानसिक शांति और 'पीस ऑफ माइंड' किसी भी मोटी तनख्वाह वाली नौकरी से ज्यादा कीमती है। वे उस जिंदगी को जीना नहीं चाहते जहां पैसा तो बहुत हो, लेकिन उसे खर्च करने का समय और सुकून ही न हो।
काम की बदलती दुनिया: कोरोना के बाद 'वर्क फ्रॉम होम' और फ्रीलांसिंग के बढ़ते चलन ने भी इस ट्रेंड को हवा दी है। अब लोग समझ गए हैं कि काम करने के लिए 9 से 5 की नौकरी ही एकमात्र रास्ता नहीं है।
तो, माइक्रो-रिटायरमेंट काम से भागना नहीं है, बल्कि यह काम करने के तरीके को और बेहतर और टिकाऊ बनाने का एक नया नजरिया है। यह उस पुरानी सोच को चुनौती देता है जो कहती है कि जिंदगी के बेहतरीन साल सिर्फ काम करने के लिए होते हैं। यह नई पीढ़ी का कहना है कि काम और जिंदगी साथ-साथ चलनी चाहिए, एक के बाद एक नहीं।
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