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Up Kiran, Digital Desk: डायबिटीज को अक्सर लोग सिर्फ “शुगर बढ़ने” की दिक्कत मानकर हल्के में ले लेते हैं। लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह बीमारी चुपचाप शरीर के भीतर नसों, धमनियों और अहम अंगों को कमजोर करती रहती है। खासतौर पर आम लोगों में जागरूकता की कमी और रोजमर्रा की गलत आदतें नर्व डैमेज, ब्लॉकेज और पैरों में गंभीर घावों का कारण बन रही हैं। यह नुकसान अचानक नहीं होता, बल्कि सालों की लापरवाही इसका रास्ता तैयार करती है।

सिर्फ रिपोर्ट ठीक होना काफी नहीं

कई डायबिटीज मरीज यह मान लेते हैं कि अगर शुगर की रिपोर्ट या HbA1c कंट्रोल में है तो खतरा टल गया। जबकि हकीकत यह है कि शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस, अंदरूनी सूजन और फैट से जुड़ा नुकसान लगातार बढ़ सकता है। इन वजहों से नसों और रक्त नलिकाओं की ताकत धीरे-धीरे घटती चली जाती है। इसलिए केवल शुगर के आंकड़ों पर निर्भर रहना सुरक्षित नहीं माना जाता।

ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल की अनदेखी

डॉक्टरों के मुताबिक डायबिटीज के साथ अगर हाई बीपी और बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल जुड़ जाए तो यह धमनियों के लिए खतरनाक स्थिति बन जाती है। ऐसे मरीजों में नसों के सिकुड़ने और ब्लॉकेज का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। केवल शुगर कंट्रोल करना यहां पर्याप्त उपाय नहीं होता।

शारीरिक गतिविधि की कमी

दर्द या झनझनाहट के कारण बहुत से मरीज चलना-फिरना कम कर देते हैं। इसका सीधा असर ब्लड सर्कुलेशन पर पड़ता है। पैरों तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व कम पहुंचते हैं जिससे नर्व डैमेज तेजी से बढ़ने लगता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि रोजाना हल्की वॉक भी नसों को सक्रिय रखने में अहम भूमिका निभाती है।

पैरों की देखभाल में देरी

डायबिटीज से जूझ रहे लोग अक्सर तब तक पैरों पर ध्यान नहीं देते जब तक कोई घाव या अल्सर न बन जाए। जबकि शुरुआती संकेत पहले ही दिखने लगते हैं। जैसे सुन्नपन, जलन, झनझनाहट या त्वचा का रंग बदलना। समय रहते इन लक्षणों को नजरअंदाज करना आगे चलकर गंभीर परेशानी खड़ी कर सकता है।

आदतें न बदलना सबसे बड़ी गलती

कई मरीज दवाओं से दर्द या जलन को दबा लेते हैं लेकिन नींद की कमी, असंतुलित खानपान और लंबे समय तक बैठे रहने जैसी आदतें नहीं सुधारते। हेल्थ एक्सपर्ट्स का साफ कहना है कि लाइफस्टाइल में बदलाव किए बिना नसों और धमनियों को सुरक्षित रखना मुश्किल हो जाता है।

पूरी बॉडी पर असर डालती है डायबिटीज

डायबिटीज सिर्फ शुगर तक सीमित बीमारी नहीं है। इसका असर दिल, दिमाग, किडनी और पैरों की नसों तक पहुंचता है। इसलिए वैस्कुलर डैमेज को धीमा करने के लिए समय-समय पर जांच बेहद जरूरी मानी जाती है।