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Up kiran,Digital Desk : न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निचली अदालतों में काम कर रहे न्यायाधीशों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और सख्त संदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी न्यायिक अधिकारी के फैसले से असहमति या निर्णय में संभावित त्रुटि के आधार पर उसे विभागीय कार्रवाई या आपराधिक मुकदमे का सामना नहीं करना चाहिए। अदालत ने कहा कि डर के साए में काम करने वाला जज कभी भी निष्पक्ष न्याय नहीं कर सकता।

यह टिप्पणी मध्य प्रदेश के जिला न्यायाधीश निर्भय सिंह सुलिया के मामले में की गई, जिन्हें आबकारी अधिनियम से जुड़े मामलों में जमानत देते समय अलग-अलग मापदंड अपनाने के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। राज्य सरकार ने यह कार्रवाई हाईकोर्ट की सिफारिश के बाद की थी। जांच अधिकारी ने जमानत आदेशों को भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए आरोपों को सही माना था। इस फैसले को सुलिया ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां उन्हें बड़ी राहत मिली।

सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट और कड़ी टिप्पणी

जस्टिस जे.बी. परदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि न्यायिक अधिकारी का मूल काम निर्णय देना है और हर निर्णय में किसी न किसी पक्ष का असंतुष्ट होना स्वाभाविक है। ऐसे असंतुष्ट लोग बदले की भावना से झूठे आरोप भी लगा सकते हैं। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि न्यायाधीशों को डराकर न्याय व्यवस्था को कमजोर नहीं किया जा सकता।

27 साल की बेदाग सेवा पर सवाल उठाना दुर्भाग्यपूर्ण

अदालत ने कहा कि निर्भय सिंह सुलिया ने करीब 27 वर्षों तक ईमानदारी और निष्ठा के साथ सेवा दी। केवल चार जमानत आदेशों के आधार पर उन्हें भ्रष्ट घोषित कर देना और नौकरी से निकाल देना न सिर्फ अन्यायपूर्ण बल्कि बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि ट्रायल कोर्ट के न्यायाधीशों पर काम का भारी दबाव होता है और रोजाना बड़ी संख्या में मामलों की सुनवाई करनी पड़ती है, इसके बावजूद अधिकतर न्यायिक अधिकारी पूरी ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हैं।

जांच में गंभीर खामियां

शीर्ष अदालत ने जांच रिपोर्ट को भी गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण बताया। कोर्ट ने कहा कि न तो शिकायतकर्ता से पूछताछ की गई और न ही उस स्टेनोग्राफर को बुलाया गया, जिस पर कथित रूप से भ्रष्टाचार में शामिल होने का आरोप था। उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति उस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकता था, जिस पर जांच अधिकारी पहुंचा।

पूरी तनख्वाह और ब्याज देने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने 2 सितंबर 2015 की बर्खास्तगी, अपीलीय आदेश और हाईकोर्ट के फैसले—तीनों को रद्द कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि निर्भय सिंह सुलिया को सेवानिवृत्ति की आयु तक सेवा में माना जाए। साथ ही, उन्हें सभी बकाया वेतन और लाभ छह प्रतिशत ब्याज के साथ आठ सप्ताह के भीतर दिए जाएं।

झूठी शिकायतों पर भी सख्त रुख

अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि देश के कई हिस्सों में कुछ शरारती तत्व और बार से जुड़े कुछ लोग झूठी या गुमनाम शिकायतें कर न्यायाधीशों को डराने की कोशिश करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, जिसमें अवमानना की कार्यवाही भी शामिल हो सकती है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सही हों, तो बिना किसी ढिलाई के विभागीय या आपराधिक कार्रवाई की जानी चाहिए। न्याय और संतुलन—दोनों जरूरी हैं।