Up Kiran, Digital Desk: मुर्शिदाबाद जिले में पूर्व टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर ने ठीक उसी दिन मस्जिद का शिलान्यास किया जिस दिन 1992 में अयोध्या की बाबरी मस्जिद गिरी थी। सऊदी अरब से मौलाना बुलाए गए और हजारों लोग जुटे। यह सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले साफ राजनीतिक संदेश था।
ममता से बगावत और नई पार्टी का ऐलान
टीएमसी से निलंबन के बाद कबीर ने तुरंत नई पार्टी बनाने और असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM से गठजोड़ का फैसला लिया। मुर्शिदाबाद की सियासत में यह कदम अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे की बड़ी वजह बन सकता है।
राजनीतिक दल-बदल का पुराना खिलाड़ी
हुमायूं कबीर का सियासी सफर बेहद रंगीन रहा। कांग्रेस से शुरुआत की। फिर टीएमसी जॉइन की और ममता सरकार में मंत्री बने। 2015 में छह साल के लिए टीएमसी से निकाले गए तो 2016 में निर्दलीय लड़े और हारे। 2018 में भाजपा में गए। 2019 में मुर्शिदाबाद लोकसभा सीट से भाजपा टिकट पर लड़े लेकिन तीसरे नंबर रहे। छह साल बाद फिर टीएमसी में लौटे और 2021 में भरतपुर सीट से विधायक चुने गए।
2019 लोकसभा में मिले इतने वोट
उस चुनाव में टीएमसी के अबू ताहिर खान को छह लाख से ज्यादा वोट मिले। कांग्रेस के अबू हेना दूसरे स्थान पर रहे जबकि भाजपा उम्मीदवार हुमायूं कबीर को 2 लाख 47 हजार 809 वोट ही मिले।
वो विवादास्पद बयान जो आज भी गूंजता है
पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान कबीर ने रैली में कहा था कि जीत के दो घंटे के अंदर हिंदुओं को भागीरथी नदी में डुबो देंगे क्योंकि मुर्शिदाबाद में 70 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। इस बयान पर भाजपा ने जोरदार हमला बोला था और मामला काफी गरमाया था।
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