Up kiran,Digital Desk : भाजपा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को ध्यान में रखते हुए अपनी सियासी तैयारियां तेज कर दी हैं। सोमवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात के बाद प्रदेश की राजनीति में हलचल बढ़ गई है। इस बैठक के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि यूपी मंत्रिमंडल में जल्द ही बड़ा फेरबदल देखने को मिल सकता है।
इन अटकलों को उस वक्त और मजबूती मिली जब दोनों उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक भी दिल्ली में मौजूद रहे। पार्टी के भीतर यह संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा नेतृत्व प्रदेश सरकार और संगठन दोनों स्तरों पर बड़े बदलाव को लेकर गंभीर मंथन कर रहा है। माना जा रहा है कि इस फेरबदल में आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को खास महत्व दिया जाएगा।
मंत्रिमंडल और संगठन में हो सकते हैं बड़े बदलाव
सूत्रों के मुताबिक योगी आदित्यनाथ मंत्रिमंडल में कई मंत्रियों के विभाग बदले जा सकते हैं, जबकि कुछ चेहरों को सरकार से हटाकर संगठन में नई जिम्मेदारी दी जा सकती है। वहीं जातीय संतुलन साधने के लिए कुछ वर्गों से जुड़े प्रभावी चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल करने की भी तैयारी है।
सिर्फ प्रदेश सरकार ही नहीं, बल्कि भाजपा की केंद्रीय इकाई में भी बदलाव की संभावना जताई जा रही है। यूपी के कुछ नेताओं को केंद्रीय संगठन में जगह मिल सकती है, जबकि कुछ नेताओं को प्रदेश में विशेष जिम्मेदारी देकर चुनावी रणनीति में लगाया जा सकता है।
बिहार मॉडल से यूपी में दोहराव की कोशिश
भाजपा-जदयू गठबंधन को बिहार विधानसभा चुनाव में मिली सफलता को पार्टी यूपी के लिए एक उदाहरण के रूप में देख रही है। उस जीत के पीछे व्यापक जातीय गठजोड़ को सबसे अहम कारण माना गया था। भाजपा अब उसी अनुभव को उत्तर प्रदेश में लागू कर लोकसभा चुनाव में खिसके अपने जनाधार को फिर से मजबूत करना चाहती है।
पार्टी का लक्ष्य है कि 2017 और 2022 विधानसभा चुनावों जैसी जीत को दोबारा दोहराया जाए और इसके लिए सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से साधा जाए।
ब्राह्मणों पर फोकस, पीडीए रणनीति का जवाब
पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि भाजपा समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को कमजोर करने के लिए नई सामाजिक रणनीति पर काम कर रही है, जिसका असर संगठन और सरकार दोनों में नजर आ सकता है।
इसके साथ ही भाजपा अपने पारंपरिक वोट बैंक ब्राह्मण और ठाकुर समाज को भी साधे रखने की कोशिश करेगी। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि नए और पुराने सामाजिक समीकरणों के संतुलन के जरिए ही 2027 के चुनाव में मजबूत बढ़त बनाई जा सकती है।
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