Up Kiran, Digital Desk: जब भी मध्य पूर्व में तनाव बढ़ता है दुनिया की नजरें सिर्फ मिसाइलों या तेल पर नहीं टिकतीं बल्कि उस आम ईरानी नागरिक पर भी जाती हैं जो इन भू-राजनीतिक दांव-पेंचों की सबसे बड़ी कीमत चुका रहा है। दशकों से प्रतिबंधों में घिरा ईरान आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ईरान कैसे टिका है बल्कि यह भी है कि इसकी रणनीतियों का बोझ उसकी जनता कैसे झेल रही है।
आर्थिक प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को भीतर से झकझोर दिया
अमेरिका के कड़े आर्थिक प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को भीतर से झकझोर दिया है। रियाल की गिरती कीमत बेलगाम महंगाई और बेरोजगारी ने आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी मुश्किल बना दी है। खाने-पीने की चीजें महंगी हैं नौकरियां अस्थिर हैं और भविष्य को लेकर अनिश्चितता हर घर में महसूस की जा सकती है। सरकार अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भले ही मजबूती दिखाती हो लेकिन घरेलू स्तर पर असंतोष लगातार बढ़ता गया है।
ईरान की भौगोलिक स्थिति उसे एक अलग तरह की ताकत देती है। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का करीब एक चौथाई तेल गुजरता है। इस रास्ते पर किसी भी तरह की रुकावट का सीधा असर वैश्विक बाजार और ईंधन की कीमतों पर पड़ता है। जब भी तनाव बढ़ता है ईरान की चेतावनी मात्र से ही अंतरराष्ट्रीय बाजारों में हलचल मच जाती है। इसका असर अंततः दुनियाभर के उपभोक्ताओं तक पहुंचता है।
सीधे युद्ध से ईरान ने बचते हुए अपने प्रभाव को फैलाने का अलग रास्ता चुना है। लेबनान में हिजबुल्लाह यमन में हूती गाजा में हमास और इराक की शिया मिलिशिया जैसे समूह उसके प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा हैं। यह नेटवर्क ईरान को अपने विरोधियों पर दबाव बनाने का मौका देता है। हालांकि इसका नतीजा यह होता है कि पूरा क्षेत्र लंबे समय तक अस्थिर बना रहता है और आम नागरिक सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।
आधुनिक लड़ाकू विमानों की कमी के बावजूद ईरान ने ड्रोन और मिसाइल तकनीक में तेजी से निवेश किया। शाहेद ड्रोन और बड़े मिसाइल भंडार ने उसे सैन्य रूप से आत्मनिर्भर बनाया। फतह हाइपरसोनिक मिसाइल के दावे ने यह दिखाया कि ईरान तकनीकी प्रतिबंधों के बावजूद नई क्षमताएं विकसित कर रहा है। यह शक्ति उसे रणनीतिक बढ़त देती है लेकिन इसके विकास की कीमत भी देश की अर्थव्यवस्था और संसाधनों को चुकानी पड़ती है।
पश्चिम से रिश्ते बिगड़ने के बाद ईरान ने एशिया की ओर रुख किया। चीन के साथ लंबी अवधि का समझौता और रूस के साथ बढ़ती नजदीकी ने उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई सांस दी। चीन द्वारा तेल खरीद और रूस के साथ सैन्य सहयोग ने प्रतिबंधों के असर को कुछ हद तक कम किया। ब्रिक्स में शामिल होना भी इसी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
आर्थिक तंगी और सामाजिक दबाव ने जनता को सड़कों पर उतरने पर मजबूर किया। महसा अमीनी की मौत के बाद शुरू हुआ आक्रोश समय के साथ और गहराता गया। दिसंबर 2025 के अंत में शुरू हुए प्रदर्शनों ने सत्ता संरचना को खुली चुनौती दी। सुरक्षा बलों की सख्ती इंटरनेट बंदी और हजारों मौतों की रिपोर्टों ने हालात को और गंभीर बना दिया। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार मृतकों की संख्या तीन हजार से अधिक बताई जा रही है जबकि सरकारी आंकड़े सामने नहीं आए।

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