Up Kiran, Digital Desk: बिहार की राजनीति को जिसकी नब्ज पर सबसे सटीक पकड़ मानी जाती है, उस 'राजनीतिक चाणक्य' प्रशांत किशोर (PK) ने हाल ही में हुए लोकसभा उपचुनावों में हुई बंपर वोटिंग पर एक ऐसा विश्लेषण किया है, जिसने पटना से लेकर दिल्ली तक के सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। जहाँ सभी पार्टियां इस बढ़े हुए वोटिंग प्रतिशत को अपने-अपने हक में मान रही हैं, वहीं प्रशांत किशोर ने इसके पीछे छिपे एक बहुत बड़े "बदलाव" की ओर इशारा किया है।
और इस बदलाव के सबसे बड़े हीरो हैं - घर लौटे प्रवासी मजदूर!
क्या कहा प्रशांत किशोर ने?
जन सुराज पदयात्रा के दौरान मीडिया से बात करते हुए प्रशांत किशोर ने साफ कहा कि उपचुनावों में दिखा यह उत्साह किसी पार्टी या नेता के प्रति प्यार नहीं, बल्कि मौजूदा व्यवस्था के प्रति जनता के गुस्से और बदलाव की इच्छा का प्रतीक है।
उन्होंने कहा, "जब भी वोटिंग सामान्य से ज्यादा होती है, तो इसका मतलब है कि लोग सिर्फ वोट नहीं डाल रहे, बल्कि वो एक बदलाव चाहते हैं। यह एक बहुत बड़ा संकेत है।"
क्यों हैं 'प्रवासी मजदूर' इस बदलाव के केंद्र में?
प्रशांत किशोर के विश्लेषण का सबसे दिलचस्प हिस्सा है प्रवासी मजदूरों की भूमिका। उन्होंने बताया कि इस बार के चुनावों में उन लाखों प्रवासी मजदूरों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है, जो लॉकडाउन के बाद या दूसरे कारणों से बिहार वापस लौटे हैं। और इस बार उनका वोट देने का तरीका बिल्कुल अलग है।
पीके ने समझाया:
जाति-धर्म से ऊपर उठकर वोट: प्रशांत किशोर का मानना है कि ये वो मजदूर हैं जिन्होंने बिहार से बाहर दिल्ली, मुंबई, गुजरात जैसे राज्यों में काम किया है। उन्होंने वहां विकास देखा है, बेहतर जिंदगी देखी है। इसलिए जब वो लौटकर अपने गांव में वही पुरानी गरीबी, बेरोजगारी और बदहाली देखते हैं, तो उनका वोट अब जाति या धर्म के नाम पर नहीं, बल्कि गुस्से और अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के सवाल पर पड़ता है।
सरकार से नाराजगी: ये वो लोग हैं जो मौजूदा सरकार के कामकाज से सबसे ज्यादा असंतुष्ट हैं। उन्हें न तो बिहार में रोजगार मिला और न ही बाहर उनके सम्मान की रक्षा हुई। उनका यह गुस्सा ही वोटिंग प्रतिशत के रूप में बाहर निकल रहा है।
असली 'गेम चेंजर': पीके का मानना है कि इन प्रवासी मजदूरों का वोट ही इस बार के उपचुनावों का असली 'गेम चेंजर' साबित हो सकता है, जिसके बारे में बड़ी-बड़ी पार्टियां अंदाजा भी नहीं लगा पा रही हैं।
प्रशांत किशोर का यह विश्लेषण सिर्फ इन उपचुनावों के लिए नहीं, बल्कि बिहार की आने वाली राजनीति के लिए भी एक बहुत बड़ी चेतावनी है। यह बताता है कि बिहार का वोटर अब बदल रहा है, और अब उसे सिर्फ जाति और धर्म के पुराने समीकरणों में बांधकर नहीं रखा जा सकता। अब उसे सड़क, बिजली, पानी, रोजगार और सम्मान चाहिए।
अब यह तो नतीजे ही बताएंगे कि प्रशांत किशोर की यह भविष्यवाणी कितनी सटीक बैठती है, लेकिन उनके इस एक विश्लेषण ने बिहार की राजनीति में एक नई बहस को जरूर जन्म दे दिया है।
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