Up kiran,Digital Desk : इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर लोकसभा अध्यक्ष द्वारा उनके खिलाफ गठित जांच समिति को चुनौती दी है। इस समिति को उनके खिलाफ भ्रष्टाचार आरोपों की जांच के लिए बनाया गया था, लेकिन वर्मा का कहना है कि यह असंवैधानिक और विधि के विपरीत है।
क्या है मामला?
न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव 21 जुलाई 2025 को दोनों सदनों — लोकसभा और राज्यसभा — में एक ही दिन पेश किए गए थे। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया, जबकि राज्यसभा में उसी प्रस्ताव को बाद में खारिज कर दिया गया। वर्मा की याचिका में कहा गया है कि जज (जांच) अधिनियम, 1968 और संविधान के प्रावधानों के अनुसार, ऐसी समिति केवल दोनों सदनों की संयुक्त सहमति से बनाई जा सकती है, न कि एकतरफा निर्णय से।
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी की दलील में बताया गया कि अगर दोनों सदनों में एक ही दिन मोशन पेश हुआ है तो जांच समिति का गठन लोकसभा अध्यक्ष अकेले नहीं कर सकते, और वर्तमान समिति को कानूनी रूप से ‘नॉन‑एस्ट’ (अवैध) माना जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह भी सवाल उठाया गया कि क्या राज्यसभा में मोशन खारिज होने के बावजूद जांच प्रक्रिया जारी रखना संवैधानिक रूप से सही है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और संवैधानिक सवाल
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह मामला संवैधानिक टकराव का रूप ले चुका है, क्योंकि याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि लोकसभा अध्यक्ष की कार्रवाई, मोशन की स्वीकृति और जांच समिति के नोटिस को रद्द करने का निर्देश दिया जाए। अदालत ने मामले को गंभीरता से लिया है और दोनों पक्षों की दलीलों को सुन रही है।
यह मामला न्यायिक जवाबदेही और संसद की प्रक्रिया के बीच की जटिलता को रेखांकित करता है, क्योंकि न्यायाधीशों के खिलाफ ऐसे मामलों में विधि अनुसार सही प्रक्रिया का पालन अनिवार्य होती है।
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