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Up Kiran,Digital Desk : प्रेमानंद जी महाराज, राधावल्लभ संप्रदाय के एक प्रतिष्ठित गुरु और हिंदू तपस्वी हैं, जिनकी उपदेशों का असर केवल धार्मिक नहीं, बल्कि लोगों के जीवन के हर पहलू पर दिखाई देता है। वह अपनी सरलता, भक्ति और सशक्त प्रवचनों के लिए जाने जाते हैं। उनके अनुयायी हर दिन उनके सत्रों में शामिल होते हैं, जहां वह न सिर्फ धार्मिक सवालों के जवाब देते हैं, बल्कि जीवन को जीने का तरीका भी सिखाते हैं। उनके शब्दों का प्रभाव इतना गहरा है कि यह बच्चों से लेकर युवाओं तक हर आयु वर्ग के बीच लोकप्रिय हैं।

भक्ति में कर्म का महत्व

प्रेमानंद जी महाराज का मानना है कि भक्ति का मार्ग केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं होता। उनका दृष्टिकोण यह है कि भगवान का नाम जप करते हुए किसी भी कार्य को पूरी निष्ठा और एकाग्रता से किया जा सकता है। उनका कहना है कि “अभ्यास योग युक्तेन चेतसा नान्यगामिना” का अर्थ है कि जब मन पूरी तरह से एकाग्र होकर परमात्मा का ध्यान करता है, तो सभी कार्य सहज हो जाते हैं और व्यक्ति अपने कर्तव्यों को सही ढंग से निभाता है।

भक्ति में निरंतरता और निष्ठा

प्रेमानंद जी महाराज यह भी कहते हैं कि जब तक हम किसी कार्य को पूरी एकाग्रता और समर्पण के साथ नहीं करते, तब तक उसका वास्तविक लाभ नहीं मिलता। चाहे वह किसी भी प्रकार का कार्य हो, जैसे घर का काम, बच्चों की देखभाल या किसी अन्य कार्य में, यदि हम इसे भगवान के नाम के साथ करते हैं तो वह कार्य पवित्र हो जाता है। उनका कहना है कि जैसे हम अपने शरीर को कभी नहीं भूलते, वैसे ही हमें भगवान का स्मरण हमेशा करना चाहिए।

अनुशासन और अभ्यास की भूमिका

प्रेमानंद जी महाराज का मानना है कि किसी भी कार्य में महारत हासिल करने के लिए निरंतर अभ्यास आवश्यक है। वह उदाहरण के रूप में निशानेबाजों का हवाला देते हैं, जो निरंतर अभ्यास के बाद ही किसी भी स्थिति में सही निशाना साध सकते हैं। इसी प्रकार, यदि हम अभ्यास और आत्मा की शुद्धता के साथ जीवन जीते हैं, तो हर कार्य में हम खुद को पूर्ण रूप से समर्पित कर सकते हैं।