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UP Kiran,Digital Desk: रूस और पश्चिमी देशों के बीच बयानबाजी एक बार फिर तेज हो गई है, जब रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने नाटो और यूरोपीय संघ के निर्णय प्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे संगठनों को अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी बताते हुए नाटो की कार्यप्रणाली की आलोचना की। इस बयान को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़े विवाद के रूप में देखा जा रहा है, जो अमेरिका और यूरोपीय संघ के प्रभाव को चुनौती दे रहा है।

नाटो पर रूस का हमला

रूस के विदेश मंत्री लावरोव ने नाटो पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि नाटो में निर्णय प्रक्रिया पूरी तरह से अमेरिका के दबाव में रहती है। उनके अनुसार, नाटो के फैसले अमेरिकी नेतृत्व के तहत होते हैं, जिससे बाकी देशों की राय को नजरअंदाज किया जाता है। लावरोव का कहना था कि ब्रिक्स और SCO जैसे संगठन सभी सदस्य देशों की सहमति से फैसले लेते हैं, जो उन्हें नाटो से अधिक लोकतांत्रिक और समान अधिकारों वाला बनाता है।

यूरोपीय संघ के फैसलों पर सवाल

लावरोव ने यूरोपीय संघ की आलोचना करते हुए कहा कि ब्रसेल्स में बैठे "गैर-निर्वाचित अधिकारी" यूरोपीय देशों की सरकारों पर दबाव डालते हैं और उन्हें बताते हैं कि किससे व्यापार करना चाहिए और किससे दूरी बनानी चाहिए। इस पर उन्होंने हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान के उस बयान का हवाला दिया, जिसमें ओरबान ने यूरोपीय संघ पर यूक्रेन संकट को बढ़ावा देने और न्याय प्रणाली को कमजोर करने का आरोप लगाया था।

ब्रिक्स बनाम पश्चिमी प्रभुत्व

रूसी विदेश मंत्री ने ब्रिक्स को एक नई वैश्विक व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया, जो पश्चिमी देशों की शक्तियों के विकल्प के तौर पर उभर रहा है। उनका कहना था कि ब्रिक्स दुनिया के विकासशील देशों की आवाज़ को सुनने का एक मंच है। लावरोव ने इसे बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर एक महत्वपूर्ण कदम बताया, जिसमें किसी एक देश या समूह का वर्चस्व नहीं होगा। ब्रिक्स का विस्तार और नए देशों की भागीदारी इसे एक मजबूत और समृद्ध वैश्विक मंच के रूप में स्थापित कर रही है।

अमेरिका का 'अनुचित प्रतिस्पर्धा' अभियान

लावरोव ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि वह रूस की ऊर्जा कंपनियों को वैश्विक बाजार से बाहर करने के लिए प्रतिबंधों का सहारा ले रहा है। उनका कहना था कि अमेरिका का उद्देश्य न केवल रूस की व्यापारिक गतिविधियों को प्रभावित करना है, बल्कि भारत और अन्य ब्रिक्स देशों के साथ उनके सैन्य और व्यापारिक रिश्तों को भी कमजोर करना है। यह एक असंतुलित प्रतिस्पर्धा का रूप लेता जा रहा है, जो रूस और उसके सहयोगी देशों के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकता है।