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Up Kiran, Digital Desk: हाल ही में जर्मनी में कार्यरत एक भारतीय सॉफ़्टवेयर इंजीनियर कौस्तव बनर्जी की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने भारत और यूरोप के कार्य संस्कृति में मौजूद ज़बरदस्त अंतर को उजागर कर दिया है. कौस्तव ने अपने निजी अनुभवों के आधार पर यह बताया है कि कैसे भारत में पेशेवर जीवन अक्सर भारी दबाव, अत्यधिक काम और मानसिक तनाव का पर्याय बन जाता है, जबकि यूरोप में काम के प्रति एक बिल्कुल नई और सकारात्मक सोच देखने को मिलती है. उनकी पोस्ट ने भारतीय कॉर्पोरेट जगत की चुनौतियों पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है.

काम ही सब कुछ: भारत में संतुलन की कमी

कौस्तव याद करते हैं कि 2013 में अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के समय तक उन्हें 'वर्क-लाइफ बैलेंस' की अवधारणा भी नहीं पता थी. भारत में जब उन्होंने नौकरी शुरू की, तो उनसे और उनके सहयोगियों से रोज़ाना '200 प्रतिशत देने' की अप्रत्यक्ष अपेक्षा की जाती थी. इस वातावरण में, अत्यधिक काम, थकान (बर्नआउट), और निरंतर तेज़ गति से काम करना सामान्य नियम बन गया था.

उनके अनुसार, ऐसे माहौल में व्यक्तिगत स्वास्थ्य, मानसिक शांति और परिवार के लिए समय निकालना लगभग असंभव हो जाता है. यहाँ कर्मचारियों की कुशल-मंगल पूछने के बजाय, केवल काम की प्रगति पर ही ध्यान केंद्रित किया जाता है.

कागज़ी छुट्टियाँ और छुट्टियों के लिए संघर्ष

कौस्तव ने बताया कि भारत में सालाना छुट्टियाँ केवल मानव संसाधन (HR) रिकॉर्ड तक सीमित रह जाती हैं; उन्हें वास्तव में इस्तेमाल करना बेहद मुश्किल होता है. अक्सर, वीकेंड पर काम करने के बदले मिलने वाली क्षतिपूर्ति अवकाश (Compensatory Leave) भी बेकार चली जाती है. उनके अनुभव में, अवकाश के लिए आवेदन करना भी एक तरह के संघर्ष से कम नहीं लगता.

यूरोप का अनुभव: काम से मुक्ति और तरोताज़ा होना

जर्मनी आने के बाद कौस्तव की ज़िंदगी में सकारात्मक बदलाव आए हैं. यूरोपीय देशों में काम करने का नज़रिया भारत से बहुत अलग है.

यहाँ ऑफिस का समय समाप्त होते ही कर्मचारी पूरी तरह से 'काम से मुक्त' माने जाते हैं. उनसे यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे देर रात ई-मेल का जवाब दें या सप्ताहांत (वीकेंड) पर काम करें. कंपनियों का मानना है कि कर्मचारियों को परिवार, स्वास्थ्य और निजी जीवन के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए, और वे निजी समय में दखल को गलत मानती हैं.