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Up Kiran, Digital Desk: हर साल बोर्ड और फाइनल एग्जाम का मौसम आता है तो घर में जैसे युद्ध जैसा माहौल हो जाता है। बच्चा तो पहले से ही तनाव में होता है और ऊपर से माता-पिता की एक-एक बात उस पर गोली की तरह चलती है। ज्यादातर पैरेंट्स को लगता है कि वे बच्चे की भलाई के लिए ही दबाव डाल रहे हैं लेकिन हकीकत यह है कि उनकी कई बातें बच्चे के आत्मविश्वास को चूर-चूर कर देती हैं। पेरेंटिंग एक्सपर्ट अर्पिता अक्षय से लंबी बातचीत के बाद मैंने जो समझा वह आपके साथ साझा कर रहा हूं। ये पांच गलतियां लगभग हर घर में होती हैं और इन्हें रोकने से बच्चे का रिजल्ट अपने आप बेहतर हो जाता है।

पुराना रिजल्ट निकालकर मत डराओ

“पिछली बार तुमने तो 58 ही लाए थे ना? इस बार फिर वही होगा तो?” यह वाक्य सुनते ही बच्चे के दिमाग में सिर्फ डर बैठ जाता है। वह किताब खोलता है तो पुरानी असफलता बार-बार सामने आने लगती है। पढ़ाई की जगह वह बस यही सोचता रहता है कि कहीं फिर फेल न हो जाए। नतीजा? इस बार भी वही होता है जिसका डर था। एक्सपर्ट कहते हैं कि पुराना रिजल्ट भूल जाओ। बच्चे को सिर्फ आज और आने वाले पेपर की बात करो। उसकी आंखों में भविष्य का भरोसा जगाओ न कि बीते कल का डर।

हर आधे घंटे में तैयारी का हिसाब मत मांगो

“कितने चैप्टर हो गए? रिवीजन शुरू किया? अभी तक तो सिर्फ दो सब्जेक्ट ही खत्म हुए?”

ऐसा लगातार पूछना बंद करो। बच्चा पहले से ही प्लान करके पढ़ रहा होता है। आपकी यह जासूसी उसे लगने लगता है कि घरवाले उस पर भरोसा ही नहीं करते। तनाव बढ़ता है और पढ़ाई का सारा मजा खत्म हो जाता है। बस एक बार प्यार से पूछ लो कि कुछ चाहिए तो बताना और फिर उसे उसकी मर्जी से पढ़ने दो। यकीन मानिए शांत दिमाग से वह कहीं ज्यादा कर लेगा।

पड़ोस के लल्लू-टप्पू से तुलना बंद करो

“शर्मा जी का बेटा तो हमेशा 95 से ऊपर लाता है, तुम क्यों नहीं ला पाते?” यह सुनकर बच्चा खुद को हमेशा के लिए हारा हुआ मान लेता है। उसका मन करता है कि किताबें फाड़कर फेंक दे। हर बच्चा अलग होता है। किसी की याददाश्त तेज होती है, किसी की लिखने की स्पीड अच्छी होती है, किसी को कॉन्सेप्ट समझने में समय लगता है। तुलना करने से आप उसकी खासियत को मार देते हो। बस यही कहो – “तुम जो कर रहे हो वह शानदार है, और थोड़ा और मेहनत करोगे तो और बेहतर होगा।”

आसमान से तारे तोड़ लाओ जैसी उम्मीद मत रखो

हम सभी चाहते हैं कि बच्चा टॉप करे। लेकिन अगर आप जानते हैं कि आपका बच्चा 70-75 प्रतिशत तक आराम से ला सकता है तो 95 प्रतिशत की जिद मत पकड़ो। जब बच्चे पर उसकी औकात से कहीं ज्यादा बोझ डालते हो तो वह दबाव में गलतियां करने लगता है। पेपर में आसान सवाल भी छूट जाते हैं। असल में वह परीक्षा नहीं आपकी उम्मीदों से लड़ रहा होता है। उसकी असली ताकत को पहचानो और उसी के आसपास टारगेट रखो। जब वह उस टारगेट को पार करेगा तो उसका आत्मविश्वास सातवें आसमान पर होगा।

अच्छे नंबर के लिए गिफ्ट का लालच मत दो

“98 प्रतिशत लाए तो नई बाइक पक्की” यह सुनकर बच्चा पढ़ता तो है लेकिन सीखता नहीं। उसका पूरा फोकस इनाम पर चला जाता है। अगर किसी कारणवश नंबर कम आ गए तो वह खुद को जिंदगी भर का नाकामयाब समझने लगता है।