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Up Kiran,Digital Desk: उत्तर प्रदेश सरकार ने अशासकीय सहायता प्राप्त (एडेड) विद्यालयों के शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सरकार ने एरियर भुगतान प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिससे लाखों शिक्षकों और कर्मचारियों को जल्द राहत मिल सकेगी। यह बदलाव न केवल वित्तीय राहत प्रदान करेगा, बल्कि सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने वाली परेशानी को भी समाप्त करेगा।

अब जिला स्तर पर होगा एरियर भुगतान

अब तक, शिक्षकों को एरियर प्राप्त करने के लिए विभागीय दफ्तरों में कई बार आना-जाना पड़ता था, लेकिन नए आदेश के तहत अब जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस), संयुक्त शिक्षा निदेशक (जेडी) और अपर शिक्षा निदेशक (एडी) के पास अपने-अपने स्तर पर एरियर भुगतान की शक्तियां होगी। डीआईओएस दो लाख रुपये तक के एरियर का भुगतान सीधे कर सकेंगे। जेडी को चार लाख रुपये तक और एडी को आठ लाख रुपये तक के भुगतान की स्वीकृति दी गई है। इससे बड़ी राहत यह है कि आठ लाख रुपये से ऊपर के एरियर का भुगतान अब माध्यमिक शिक्षा निदेशक द्वारा किया जा सकेगा, और इसके लिए शासन से अनुमोदन की जरूरत नहीं होगी।

फाइलों और अनुमोदन की लंबी प्रक्रिया का अब होगा अंत

अब तक, एरियर भुगतान में सबसे बड़ी दिक्कत फाइलों का अटकना और अनुमोदन की लंबी प्रक्रिया थी। कई मामलों में फाइलें महीनों तक रुकी रहती थीं, जिससे शिक्षकों को मानसिक और आर्थिक दोनों परेशानियां झेलनी पड़ती थीं। नई व्यवस्था में यह समस्याएं समाप्त हो जाएंगी क्योंकि अधिकारियों को अधिक अधिकार मिल गए हैं। इससे भुगतान में देरी की संभावना काफी हद तक कम हो जाएगी, और शिक्षकों को उनकी मेहनत का पूरा और समय पर भुगतान मिलेगा।

लाखों कर्मचारियों को मिलेगी राहत

इस परिवर्तन से प्रदेश के करीब 61,000 शिक्षक और 10,800 शिक्षणेत्तर कर्मचारी सीधे तौर पर लाभान्वित होंगे। एरियर प्राप्त करने की प्रक्रिया पहले के मुकाबले बहुत अधिक पारदर्शी और सरल हो जाएगी। महंगाई भत्ते, चयन वेतनमान, एससीपी और उपार्जित अवकाश के नकदीकरण जैसे मामलों में एरियर की प्रक्रिया अब तेजी से पूरी की जा सकेगी। इससे कर्मचारियों की वित्तीय स्थिति में सुधार आएगा और वे अपने कार्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।

न्यायालय के चक्कर अब कम होंगे

पहले, एरियर भुगतान में देरी के कारण कई शिक्षक न्यायालय का रुख करने को मजबूर होते थे, जिससे न केवल उनका समय और ऊर्जा बर्बाद होती थी, बल्कि विभागीय अधिकारियों को भी कानूनी झंझटों का सामना करना पड़ता था। नई पारदर्शी व्यवस्था के लागू होने से अब इस तरह के मामले कम होने की उम्मीद है, और शिक्षकों को उनका हक समय पर मिल सकेगा।