img

Up Kiran, Digital Desk: बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की भारी जीत के बाद जब नई कैबिनेट ने शपथ ली तो हर किसी की नजर इस बात पर टिकी थी कि नीतीश कुमार इस बार अपने पुराने सहयोगी को कितनी ताकत देंगे और भाजपा कितनी जगह बनाएगी। जवाब कल शाम विभाग बंटवारे में मिल गया। सम्राट चौधरी अब बिहार के गृह मंत्री हैं। यह पहला मौका है जब जदयू ने सबसे ताकतवर माने जाने वाले गृह विभाग को भाजपा के खाते में जाने दिया।

अमित शाह का तारापुर वाला वादा पूरा

याद कीजिए पिछले चुनाव में मुंगेर की तारापुर सीट। वहां केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह खुद पहुंचे थे। मंच से उन्होंने साफ कहा था कि सम्राट चौधरी को भारी वोटों से जिताइए, हम इन्हें सरकार में बहुत बड़ा आदमी बनाएंगे। जनता ने बात मान ली। सम्राट ने राजद उम्मीदवार को पैंतालीस हजार से ज्यादा वोटों से हराया। और अब गृह मंत्रालय देकर भाजपा ने शाह का वह वादा पूरा कर दिखाया। सियासी हलकों में इसे सम्राट का राजनीतिक कद बढ़ाने की स्पष्ट रणनीति माना जा रहा है।

सुशील मोदी भी नहीं पा सके थे गृह विभाग

दो दशक तक नीतीश कुमार के सबसे करीबी रहे सुशील कुमार मोदी भी उपमुख्यमंत्री रहते हुए सिर्फ वित्त मंत्रालय तक ही पहुंच पाए थे। दोनों की दोस्ती जगजाहिर थी फिर भी गृह विभाग कभी भाजपा को नहीं मिला। सुशील मोदी के निधन के बाद बिहार में भाजपा को एक मजबूत चेहरा चाहिए था। 2024 में जब नीतीश महागठबंधन छोड़कर फिर एनडीए में लौटे तो भाजपा ने सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा को डिप्टी सीएम बनाकर संदेश दे दिया था कि अब पार्टी अपने नेताओं को आगे बढ़ाएगी। अब गृह मंत्रालय देकर उस संदेश पर मुहर लगा दी गई है।

नीतीश ने रखी अपनी पकड़ बरकरार

हालांकि नीतीश ने गृह विभाग छोड़ा जरूर लेकिन बदले में वित्त मंत्रालय वापस ले लिया। जदयू के वरिष्ठ नेता बिजेंद्र यादव को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। सबसे अहम बात यह कि सामान्य प्रशासन विभाग अभी भी मुख्यमंत्री के पास ही है। यानी आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की पोस्टिंग ट्रांसफर का पूरा अधिकार नीतीश के हाथ में ही रहेगा। मतलब सत्ता की असली चाबी अभी भी पुराने मालिक के पास है।

नीतीश के बाद कौन? असली जंग अब शुरू

बिहार की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि नीतीश कुमार के बाद एनडीए का अगला चेहरा कौन होगा। कुछ महीने पहले तक चिराग पासवान का नाम सबसे आगे चल रहा था। उन्होंने केंद्र छोड़कर बिहार में चुनाव लड़ने की इच्छा भी जताई थी। लेकिन बाद में उन्होंने 2030 तक इंतजार करने का फैसला किया। अभी वे अपनी पार्टी का विस्तार उत्तर प्रदेश बंगाल जैसे राज्यों में कर रहे हैं और जनवरी 2026 में बिहार में बड़ी यात्रा निकालने की तैयारी में हैं।

पर चिराग की राह आसान नहीं है। उनकी पार्टी मुख्य रूप से पासवान समाज पर टिकी है जबकि महादलित वोट पर जीतन राम मांझी की पकड़ मजबूत है। एनडीए के अंदर दोनों नेताओं के बीच खटपट की खबरें भी आती रहती हैं। जानकार मानते हैं कि आने वाले दिनों में नीतीश के बाद की रेस में भाजपा खेमे से सम्राट चौधरी और सहयोगी दलों से चिराग पासवान दो बड़े ध्रुव बनकर उभर सकते हैं।