Up Kiran, Digital Desk: यह सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आत्मा की आवाज़ है. यह वो मंत्र है, जिसने गुलामी की जंजीरों में जकड़े देश को आज़ादी के लिए लड़ने की ताकत दी. हम बात कर रहे हैं हमारे राष्ट्रगीत "वंदे मातरम" की, जिसके 150 साल पूरे होने के गौरवशाली अवसर पर रेल कोच फैक्ट्री (RCF), कपूरथला में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया.
इस मौके पर RCF के अधिकारी और कर्मचारी एक साथ इकट्ठा हुए और उन्होंने न केवल इस ऐतिहासिक गीत को गाया, बल्कि इसके पीछे के महान इतिहास और त्याग को भी याद किया. कार्यक्रम की शुरुआत RCF के महाप्रबंधक द्वारा बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की तस्वीर पर फूल चढ़ाकर की गई, जिन्होंने इस अमर गीत की रचना की थी.
महाप्रबंधक ने अपने संबोधन में कहा, "वंदे मातरम सिर्फ कुछ शब्द नहीं हैं, यह हमारी मातृभूमि के प्रति प्रेम, सम्मान और भक्ति की भावना है. यह गीत हमारे स्वतंत्रता संग्राम की पहचान था और आज भी यह हमें देश के लिए कुछ करने की प्रेरणा देता है." उन्होंने बताया कि कैसे इस गीत ने उस दौर में हर भारतीय के दिल में देशभक्ति की आग जलाई थी और आज़ादी के दीवानों के लिए यह नारा बन गया था.
गीत से क्रांति तक का सफर
"वंदे मातरम" का इतिहास बहुत ही रोचक और प्रेरणादायक है.
रचना: इसकी रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में की थी. यह मूल रूप से उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंदमठ' का हिस्सा था, जो 1882 में प्रकाशित हुआ.
पहला गायन: इस गीत को पहली बार 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने गाया था.
स्वतंत्रता संग्राम की आवाज़: देखते ही देखते, यह गीत ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांति का प्रतीक बन गया. स्वतंत्रता सेनानी जुलूसों और सभाओं में इसे गाते हुए निकलते थे, और "वंदे मातरम" का नारा हर तरफ गूंजने लगा. इसने लोगों में एक ऐसी एकता और जोश भर दिया, जिससे अंग्रेजी हुकूमत भी कांपने लगी थी.
RCF कपूरथला में आयोजित यह कार्यक्रम सिर्फ एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि यह उस भावना को फिर से जीने का एक प्रयास था. यह नई पीढ़ी को यह याद दिलाने का एक तरीका था कि जिस आज़ादी में हम आज सांस ले रहे हैं, उसके पीछे "वंदे मातरम" जैसे गीतों और अनगिनत कुर्बानियों का कितना बड़ा योगदान है. कार्यक्रम का समापन वंदे मातरम के सामूहिक गायन के साथ हुआ, जिससे पूरा वातावरण देशभक्ति के रंग में सराबोर हो गया.
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